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चुनाव आयोग पर शीर्ष अदालत की राय के मायने

चुनाव आयोग स्पष्ट तौर पर विवादों से घिर गया है। विपक्ष लगातार उस पर पक्षपात और खुलकर मोदी सरकार के पक्ष में काम करने का आरोप लगा रहा है। इसके बीच ही अरुण गोयल की बतौर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को ही सवालों के घेरे में ला दिया था।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने जो फैसला सुनाया है, उसके दूरगामी परिणाम होना तय है। यह अलग बात है कि अदालत के कई अन्य निर्देशों की तरह इसे भी अगर केंद्र सरकार अनसुना ना कर दे तभी। वरना इससे पहले पेगासूस सहित कई मामलों में अदालत की राय को दरकिनार करने की प्रवृत्ति सरकार में दिखी है।

अभी इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का जो फैसला आया है उसे मात्र अंतरिम हल के रूप में ही देखा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) तथा निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए और यह नियुक्ति उस समिति की अनुशंसा पर होनी चाहिए

जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (अगर नेता प्रतिपक्ष न हो तो सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। इस आदेश का अर्थ यह है कि इस प्रक्रिया में देश की लोकतांत्रिक पद्धति को शामिल किया जाए और वह विधि सम्मत हो, इसी मकसद से मुख्य न्यायाधीश को भी इसमें शामिल रखा गया है।

वर्तमान परिस्थितियों में यह आदेश केंद्र सरकार को असहज स्थिति में डाल सकती है। वैसे भारत में पहली बार ऐसे मुद्दों पर न्यायिक बहस नहीं हो रही है। पहले से ही यह माना जाता रहा है कि निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और कार्यपालिका के किसी भी प्रभाव से मुक्त होना चाहिए। केंद्र और राज्यों के स्तर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए यह आवश्यक है।

नागरिक समाज के विभिन्न हिस्सों में भी इस बात को लेकर चिंता रही है कि सीईसी और ईसी की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है। दूसरी तरफ कानूनी प्रावधानों में संशोधन तथा कई अन्य घटनाक्रमों की वजह से ही राज्यों में पदस्थापित वरीय पदाधिकारी अब केंद्र सरकार की मर्जी के खिलाफ काम करने से डरने लगे हैं।

पश्चिम बंगाल के एक मुख्य सचिव के साथ क्या कुछ हुआ है, यह सभी ने देखा है। हालांकि आयोग में बीते तमाम वर्षों में अत्यंत ठोस और विश्वसनीय छवि वाले लोग नियुक्त हुए और उन्होंने अनेक सुधारों के साथ चुनावों को और अधिक विश्वसनीय बनाया। लेकिन, यह बात भी सही है कि हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों ने उसके आचरण पर चिंता जाहिर की है।

चाहे जो भी हो लेकिन प्रधानमंत्री या कैबिनेट की सलाह पर सीईसी और ईसी की नियुक्ति संविधान अथवा संविधान सभा की भावना के अनुरूप नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इस संदर्भ में संविधान सभा की बहसों का विस्तार से विश्लेषण किया। संविधान के अनुच्छेद 324(2) में कहा गया है कि निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा इतने ही निर्वाचन आयुक्त शामिल होने चाहिए।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा इस बारे में निर्मित कानूनों के अनुसार होनी चाहिए और उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल होनी चाहिए।’ चूंकि संसद ने इन तमाम वर्षों में कोई कानून नहीं बनाया इसलिए नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती रहीं।

प्रासंगिक अनुच्छेद की पृष्ठभूमि के बारे में बात करें तो निर्णय में कहा गया कि देश के संस्थापक बुजुर्गों का यह इरादा कतई नहीं था कि निर्वाचन आयोग की नियुक्तियों के मामले में कार्यपालिका ही समस्त निर्णय ले।

बहरहाल, चूंकि यहां मामला निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता का है तो ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अनुशंसा करने के लिए समिति गठित किए जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। उदाहरण के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की नियुक्ति भी ऐसे ही एक पैनल द्वारा की जाती है लेकिन उस पर भी उसके आचरण के लिए निरंतर हमले होते रहते हैं।

हकीकत में सीईसी और ईसी की नियुक्ति की प्रक्रिया में प्रवेश करने का अर्थ यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत को भी आलोचनाओं का सामना करना होगा। ऐसे में उपयुक्त यही होगा कि संविधान सभा ने सीईसी और ईसी की नियुक्ति को लेकर जैसा सोचा था, उस प्रकार का एक व्यापक कानून लाया जाए और इसके साथ निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता को लेकर अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाए।

इस संदर्भ में यह बात भी ध्यान देने लायक है कि कानून को केवल कार्यपालिका को अधिकार संपन्न नहीं बनाना चाहिए। यह भी अहम होगा कि बनने वाला कानून निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की स्थापना करते हुए उसे सभी संदेहों से परे करे। लेकिन वहां संसद में क्या कानून पारित होता है, यह भविष्य का एक बड़ा सवाल बनेगा।