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टाटा कंपनी विवाद पर वित्त मंत्री का नया बयान आया

विवाद सार्वजनिक रूप से सामने न आए: सीतारमण

टाटा घराना अपने अंदर ही इसे सुलझे

यह देश के लिए भी संवेदनशील मुद्दा

इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्लीः वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टाटा समूह के नेतृत्व से अपने आपसी मतभेदों को बंद कमरों के भीतर ही सुलझाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि होल्डिंग कंपनी टाटा संस और उसके सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स के बीच का विवाद एक संवेदनशील मुद्दा है, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए इसे सार्वजनिक रूप से बाहर नहीं आने देना चाहिए।  मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए सीतारमण ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करेगी या दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने का प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि इन मतभेदों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों को व्यावसायिक कुशलता और सौहार्द का परिचय देने की आवश्यकता है।

व्यावसायिक सौहार्द से हल हो मामला वित्त मंत्री ने कहा, मेरा मानना है कि ये बहुत ही संवेदनशील मामले हैं, जहां बहुत अधिक वाणिज्यिक और व्यावसायिक समझ की जरूरत होगी। व्यावसायिक सौहार्द को काम करना होगा। इसलिए मैं यह नहीं कहूंगी कि मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो, हम सीधे हस्तक्षेप करेंगे। मैं टाटा के ब्रांड मूल्य और पारसी समुदाय द्वारा टाटा को एक विशाल वैश्विक ब्रांड बनाने में दिए गए योगदान को भली-भांति जानती हूं।

उन्होंने दोनों पक्षों से सार्वजनिक रूप से आमने-सामने आने के बजाय आपस में बातचीत करने की अपील की। उन्होंने कहा, मैं उन व्यापक गतिविधियों से भी परिचित हूं जिनमें टाटा समूह निवेशित है। इसलिए, यह भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे आपस में सौहार्दपूर्ण ढंग से हल किया जाना चाहिए। उन्हें आपस में बात करके स्थिति को जल्द से जल्द सामान्य करना चाहिए। यह विवाद इस तरह सार्वजनिक रूप से बाहर नहीं आना चाहिए। शीर्ष नेतृत्व की परिपक्वता को देखते हुए, हम चाहेंगे कि यह मामला जल्द से जल्द सुलझ जाए।

158 साल पुराने समूह में मतभेद की वजहवित्त मंत्री की यह टिप्पणी 158 साल पुराने औद्योगिक समूह के भीतर उभरे आंतरिक मतभेदों के बीच आई है। एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व वाले टाटा संस के बोर्ड और नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद पिछले कई महीनों से बन रहा था, जो 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में सार्वजनिक रूप से सामने आया। दोनों पक्षों के बीच मुख्य रूप से दो मुद्दों पर मतभेद हैं—टाटा संस की प्रस्तावित शेयर बाजार लिस्टिंग और अध्यक्ष के रूप में एन चंद्रशेखरन की निरंतरता।

यह विवाद भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में टाटा संस का पंजीकरण रद्द करने के आवेदन को खारिज करने के बाद शुरू हुआ था। आरबीआई के निर्देश के एक सप्ताह के भीतर टाटा संस के बोर्ड ने केंद्रीय बैंक के नियमों के अनुसार शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का फैसला किया। इसके साथ ही बोर्ड ने अध्यक्ष के रूप में चंद्रशेखरन के पुनर्नियुक्ति को भी मंजूरी दे दी।  इस बैठक में टाटा ट्रस्ट्स का प्रतिनिधित्व करने वाले नोएल टाटा इन फैसलों के विरोध में वोट देने वाले एकमात्र निदेशक थे। वहीं, टाटा ट्रस्ट्स के दूसरे मनोनीत निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने बहुमत का साथ देते हुए फैसले के पक्ष में मतदान किया था।