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कुआं सूख गये और भटक रहे हैं वन्यजीव

भीषण सूखे से जूझ रहे हैं श्रीलंका के कई इलाके

गृहयुद्ध के बाद पहली बार ऐसी आपदा

बारिश पर निर्भर पूरी आबादी परेशान है

यह अल नीनो का ही प्रभाव बताया गया

कोलंबोः उत्तर-मध्य श्रीलंका के अपने पैतृक गांव को दशकों पहले गृहयुद्ध के कारण छोड़ने वाले समांथा पुष्पकुमारा के मन में जब अपने घर लौटने का अवसर आया, तो एक नई उम्मीद जगी थी। उन्हें पूरा विश्वास था कि अब वे चैन से खेती-बारी कर सकेंगे और अपने परिवार को एक सुरक्षित व स्थिर भविष्य दे सकेंगे। परंतु, यह राहत तब तक ही सीमित रही जब तक कुदरत ने मेहरबानी बनाए रखी और अचानक बारिश का आना पूरी तरह से बंद नहीं हो गया।

वर्तमान में श्रीलंका पिछले कई महीनों से एक भीषण सूखे की चपेट में बुरी तरह जकड़ा हुआ है। इस लंबे सूखे के कारण देश भर में भयंकर जल संकट गहराता चला गया है। स्थिति यह हो गई है कि प्रमुख जलाशय सूख चुके हैं और पूरी तरह से मौसमी मानसूनी बारिश पर अपनी आजीविका के लिए आश्रित रहने वाले किसान भारी मुसीबत में फंस गए हैं। हालात तब और अधिक चिंताजनक और बदतर हो गए जब देश के कई अलग-अलग हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी ऊपर दर्ज किया गया, और साथ ही उच्च आर्द्रता ने इस चिलचिलाती गर्मी के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया।

अपनी इस लाचारी को बयां करते हुए समांथा पुष्पकुमारा ने दर्द भरे शब्दों में कहा कि उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो वे चारों तरफ से अनहोनी और तबाही के बीच घिर चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि पानी का एक बूंद भी प्रबंध नहीं हुआ और उन्हें मजबूरी में अपनी खेती को अलविदा कहना पड़ा, तो उनके पास जीवन जीने के लिए और अपने परिवार का पेट भरने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचेगा।

इस गंभीर प्राकृतिक आपदा पर प्रकाश डालते हुए जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश की यह भारी कमी मुख्य रूप से एक मजबूत अल नीनो के प्रभाव का परिणाम है। अल नीनो समुद्री जल का एक प्राकृतिक और अस्थायी रूप से गर्म होना है, जो दुनिया भर के मौसम के चक्र को बदल देता है। इसके साथ ही, मानवीय गतिविधियों के कारण लगातार बढ़ रहा वैश्विक तापमान भी इस स्थिति को और अधिक गंभीर बना रहा है।

श्रीलंका को मुख्य रूप से दो प्रमुख मानसूनी प्रणालियों के माध्यम से वर्षा की प्राप्ति होती है, परंतु इस वर्ष सितंबर माह का अंतिम समय आ जाने के बावजूद बहुत ही नाममात्र की वर्षा दर्ज की गई है। देश भर में मौजूद कुल 74 जलाशयों का जलस्तर गिरकर अपनी क्षमता के एक-तिहाई हिस्से से भी काफी नीचे पहुंच चुका है, जिसके परिणामस्वरूप कई इलाकों में पानी की भारी किल्लत को देखते हुए प्रशासन को पानी की राशनिंग करने के लिए विवश होना पड़ा है।

इस भयंकर सूखे का घातक प्रभाव केवल आम इंसानों, किसानों और उनके परिवारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों पर भी बहुत बुरी तरह पड़ रहा है। याला नेशनल पार्क जैसे प्रमुख और संरक्षित वन्यजीव अभ्यारण्यों के भीतर पानी और भोजन के प्राकृतिक स्रोत तेजी से सिमटते जा रहे हैं। हाथियों, हिरणों, जल भैंसों और मगरमच्छों जैसे तमाम वन्यजीवों को गंभीर डिहाइड्रेशन और असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ रहा है। इस संकट से बेजुबान जानवरों को बचाने के लिए वन विभाग के अधिकारी अब पानी के टैंकरों और भूमिगत पाइपलाइनों के जरिए जंगलों के भीतर पानी के कुंडों को कृत्रिम रूप से भरने के लिए लगातार अथक प्रयास कर रहे हैं।