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अमेरिकी जासूस को छुड़ाने के लिए ट्रंप ने पूरी ताकत लगायी

वैनडाइक को दबाव में भारत ने रिहा कर दिया

सीआईए का जासूस होने का आरोप था

म्यांमार में प्रशिक्षण देने का भी आरोप

अचानक से सरकार ढीली पड़ गयी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और खुफिया तंत्र के गलियारों में उस समय भूचाल आ गया जब भारत की गिरफ्त में आए एक अत्यंत हाई-प्रोफाइल अमेरिकी नागरिक की रिहाई का मामला सामने आया। मैथ्यू आरोन वैनडाइक, जिसे लंबे समय से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एक बेहद शातिर और गहरा मोहरा माना जाता रहा है, को आखिरकार भारतीय जेल से बाहर का रास्ता देखना पड़ा है।

पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने और म्यांमार सीमा के जरिए हथियारों की तस्करी व षड्यंत्र रचने के गंभीर आरोपों के तहत भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और एनआईए ने इसे कोलकाता और अन्य इलाकों से दबोचा था। शुरुआती दौर में इस गिरफ्तारी को भारत की सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी कूटनीतिक और सामरिक सफलता के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन अचानक बदले घटनाक्रम और कानूनी प्रक्रियाओं के चलते अमेरिकी दबाव के आगे स्थितियां बदलती नजर आईं।

सूत्रों और रिपोर्ट्स के अनुसार, इस तथाकथित अमेरिकी जासूस और उसके सहयोगियों की गिरफ्तारी के बाद से ही वाशिंगटन में बैठे डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन पर इन्हें सुरक्षित वापस स्वदेश लाने का जबरदस्त कूटनीतिक दबाव था। अमेरिकी रणनीतिक हलकों में इस बात की घबराहट थी कि यदि वैनडाइक लंबी कानूनी प्रक्रिया में फंस गया, तो कई संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय और खुफिया राज खुलकर दुनिया के सामने आ सकते हैं।

यही वजह है कि अमेरिकी सरकार और शीर्ष स्तर के राजनयिकों ने पर्दे के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी ताकि किसी तरह इस अमेरिकी ऑपरेटिव को भारतीय कानूनी शिकंजे से बाहर निकाला जा सके। हालांकि भारतीय अदालतों और एनआईए की कार्रवाई अपनी जगह जारी रही, लेकिन हाल ही में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद वैनडाइक और उसके साथियों को एक महीने के लिए राहत मिलने और जमानत पर रिहाई का रास्ता साफ होने के बाद इस पूरे मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय तत्वों की गतिविधियां अक्सर उन क्षेत्रों में पाई जाती हैं जहां अमेरिकी भू-राजनीतिक हित दांव पर होते हैं। वैनडाइक का इतिहास दुनिया के विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों जैसे लीबिया, इराक और अफगानिस्तान से जुड़ा रहा है, जहां वह निजी सुरक्षा ठेकेदार या मर्चेंडाइज ग्रुप्स की आड़ में खुफिया अभियानों को अंजाम देता रहा है।

भारत के पूर्वोत्तर और म्यांमार सीमाई इलाकों में अस्थिरता फैलाने की इस कथित साजिश के खुलासे ने यह साबित कर दिया है कि किस प्रकार विदेशी ताकतें कूटनीतिक परदों के पीछे अपने प्यादों का इस्तेमाल करती हैं। अब जबकि इस मामले में कानूनी दांवपेंच के जरिए रिहाई का सिलसिला शुरू हो चुका है, यह सवाल गंभीर रूप से खड़ा होता है कि क्या वैश्विक महाशक्तियों का दबाव अंतरराष्ट्रीय अपराध और आतंकवाद से जुड़े मामलों में भी स्थानीय न्याय प्रणालियों को प्रभावित करने में सफल हो जाता है।