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चार सौ साल से ज्यादा है इस दुर्गा पूजा का इतिहास

वीर राजा के शासनकाल में हुई थी शुरुआत

राजनगर के राजा के शासनकाल से

पूजा के साथ पौराणिक कथा भी जुड़ी

बेलेड़ा नदी से जल मंदिर लाया जाता है

राष्ट्रीय खबर

दुर्गापुरः पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत अत्यंत समृद्ध रही है, और यहां के प्राचीन पूजा-त्योहारों में बेलेड़ा गांव की दुर्गा पूजा का एक विशिष्ट स्थान है। बीरभूम के ऐतिहासिक और पारंपरिक दुर्गोत्सवों में शुमार यह पूजा जिले के राजनगर ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले बेलेड़ा गांव में आयोजित की जाती है।

इस ऐतिहासिक दुर्गा पूजा की उत्पत्ति का इतिहास राजनगर के प्रसिद्ध वीर राजा के शासनकाल से जुड़ा हुआ है, जिसकी शुरुआत बंगाली संवत 1001 (लगभग चार शताब्दी पूर्व) में हुई थी। इस प्राचीन पूजा के आरंभ होने और इसकी परंपरा के पीछे एक बेहद दिलचस्प और पारंपरिक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसका निर्वहन गांव के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ आज भी करते आ रहे हैं।

मंदिर की तांत्रिक परंपरा के अनुसार पूजा की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रफुल्ल घोषाल ने बताया कि इस ऐतिहासिक दुर्गा पूजा का शुभारंभ श्रीधरा बक्शी ने किया था। वे तीन भाई थे, जिनमें श्रीधरा बक्शी सबसे बड़े भाई थे। उन्हें पूजा के दौरान एक शालिग्राम शिला (रघुनाथ ठाकुर) प्राप्त हुई थी, जिसके बाद दैवीय स्वप्न आदेश मिलने पर उन्होंने इस दुर्गा पूजा के संचालन की पूरी जिम्मेदारी अपने मंझले भाई कीर्ति शिकदार को सौंप दी थी।

इन तीनों भाइयों—श्रीधरा बक्शी, कीर्ति सिकदार और सबसे छोटे भाई—का मूल उपनाम (सरनेम) मुखर्जी था, लेकिन उन्हें वीर राजा द्वारा उनकी सेवाओं के लिए विशेष उपाधियाँ और उपनाम प्रदान किए गए थे। बड़े भाई श्रीधरा वीर राजा के राज्य में कर (लगभग राजस्व) संग्रह का कार्य संभालते थे, जिसके कारण उन्हें बक्शी की उपाधि मिली।

इसी प्रकार, मंझले भाई कीर्ति राजघरानों और राजबाड़ी की तमाम व्यवस्थाओं व देखरेख का जिम्मा संभालते थे, जिसके चलते उन्हें सिकदार पदवी से नवाजा गया। सबसे छोटे भाई नियमित रूप से चंडी पाठ किया करते थे, इसलिए उन्हें पाठक उपनाम मिला और उनका पूरा नाम बदन चंद्र पाठक था।

बेलेड़ा गांव में इस देवी की आराधना के लिए अब एक स्थायी मंदिर भी मौजूद है। हर साल दुर्गा पूजा के आगमन से पहले पारंपरिक तरीके से यहां मिट्टी की भव्य मृण्मयी प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। महासप्तमी के दिन दुर्गा पूजा के घट (कलश) को स्थापित करने के लिए स्थानीय बेलेड़ा नदी से जल लाया जाता है। हर साल महासप्तमी के इस विशेष अवसर पर जब नदी से घट लाया जाता है, तो बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को इस लंबे रास्ते पर दंडवत करते हुए मंदिर पहुंचते देखा जाता है, जो उनकी अटूट आस्था का प्रतीक है।

पूजा के इन चार दिनों के अलावा भी पूरे वर्ष भर इस मंदिर में देवी की नित्य पूजा और अर्चना का विधान जारी रहता है। हालांकि पारंपरिक नियमों के अनुसार पूजा संपन्न होने के बाद हर साल महासप्तमी और विजयादशमी के बाद मृण्मयी प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है, लेकिन इस उत्सव से जुड़ी कई अन्य अनोखी परंपराएं आज भी जीवंत हैं।

इस मंदिर में देवी की आराधना विशेष रूप से प्राचीन वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के नियमों तथा मंत्रों के अनुसार की जाती है। महान साधक बलराम वाचस्पति (जिन्हें प्राप्त उपाधि के अनुसार वाचस्पति और मूल रूप से घोषाल उपनाम प्राप्त था) द्वारा रचे गए पूजा के वे प्राचीन मंत्र आज भी ताड़पत्रों पर लिपिबद्ध रूप में सुरक्षित हैं (जिन्हें बाद में नकल करके सहेजा गया)। आज भी उसी प्राचीन पांडुलिपि के मंत्रों और विधान के अनुसार ही यहां मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है।

इस प्राचीन आयोजन के दौरान महासप्तमी के दिन यहां पारंपरिक रूप से चाल कुम्हड़े (सफेद कद्दू) की बलिका नियम है, जबकि महाअष्टमी के पावन अवसर पर सात बकरों की बलि दिए जाने की पुरानी प्रथा चली आ रही है। दुर्गा पूजा के इन विशेष दिनों में बीरभूम जिले के कोने-कोने से लोग इस पारंपरिक और ऐतिहासिक दुर्गा पूजा के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं, जिससे यहां भारी जनसैलाब उमड़ पड़ता है।

स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूर-दराज के इलाकों से आने वाले श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में मंदिर में इकट्ठा होते हैं। उत्सव के दौरान यहां इतनी अधिक भीड़ उमड़ती है कि उसे नियंत्रित करने और संभालने में स्थानीय प्रशासन तथा पूजा आयोजकों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है, जो इस आयोजन की भव्यता और लोकप्रियता को बखूबी बयां करता है।