वर्दी छोड़कर सीधे आरएसएस ज्वाइन कर लीजिए
राष्ट्रीय खबर
मुंबई: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने शनिवार को वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और नागपुर के नवनियुक्त पुलिस आयुक्त विश्वास नांगरे पाटिल के खिलाफ तीखा हमला बोला है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब नांगरे पाटिल ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक कार्यक्रम में शिरकत की और संगठन के अनुशासन, समर्पण और देशभक्ति की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की।
राज ठाकरे ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए नांगरे पाटिल को सीधी सलाह दी कि यदि उन्हें संघ के प्रति इतना लगाव है, तो उन्हें अपनी वर्दी त्याग देनी चाहिए। ठाकरे ने अपने पोस्ट में लिखा, यदि आप संघ के प्रति स्नेह रखते हैं, तो इसे अपने दिल में रखें। यदि आप इसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना चाहते हैं, तो सेवा से इस्तीफा दें और संघ या भाजपा में शामिल हो जाएं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि असंतुष्ट अधिकारियों के लिए लंबे समय से पुनर्वास गारंटी योजना चल रही है, जिसमें उनका भी समायोजन हो जाएगा।
मनसे प्रमुख ने राज्य के मुख्यमंत्री से भी सीधा सवाल किया कि क्या सरकार आईपीएस अधिकारी की इस दोहरी निष्ठा से सहमत है? उन्होंने मुख्यमंत्री को चेतावनी दी कि यदि आज इसे नहीं रोका गया, तो भविष्य में कोई भी अधिकारी किसी भी राजनीतिक संगठन के कार्यक्रमों में शामिल होगा, तब सरकार को हंगामा करने का हक नहीं होगा। ठाकरे ने 2012 के आजाद मैदान दंगों के बाद पुलिस बल के समर्थन में आवाज उठाने पर अपने एक कांस्टेबल को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने का उदाहरण देते हुए दोहरे मानकों का आरोप लगाया।
नांगरे पाटिल की इस टिप्पणी पर विपक्ष भी हमलावर है। कांग्रेस नेता प्रफुल्ल गुडाधे ने आशंका जताई कि नांगरे पाटिल भविष्य में उन जैसे राजनीतिक नेताओं को शहरी नक्सली करार देकर गिरफ्तार कर सकते हैं। राज ठाकरे ने नांगरे पाटिल को एक कुशल अधिकारी बताते हुए उन्हें अपनी मर्यादा बनाए रखने की नसीहत दी। उन्होंने कहा, आप एक सक्षम अधिकारी हैं, कम से कम राजनीतिक दलों और संगठनों के सामने अपनी विवेकशीलता को गिरवी न रखें। एक पुलिस अधिकारी से निष्पक्ष होने और केवल अपनी वर्दी के प्रति वफादार रहने की अपेक्षा की जाती है।
गौरतलब है कि विश्वास नांगरे पाटिल 2008 के मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी वीरता के लिए पहचाने जाते हैं और राज्य के सबसे सम्मानित आईपीएस अधिकारियों में गिने जाते हैं। अब इस घटना ने नौकरशाही के राजनीतिकरण और सरकारी अधिकारियों की तटस्थता पर एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है।