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नफरत करने वालों के सीने में प्यार .. .. .. ..

महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी मानुष और भूमिपुत्र का मुद्दा दशकों से सत्ता की चाबी रहा है। लेकिन हाल ही में संपन्न हुए नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने एक नई और कड़वी हकीकत को उजागर किया है। इन चुनावों में जहाँ शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) को बड़ी सफलता की उम्मीद थी, वहीं नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि केवल क्षेत्रीय भावनाओं को भड़का कर अब सत्ता के शिखर तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस चुनावी हार या अपेक्षित सफलता न मिलने के पीछे राज ठाकरे का उत्तर भारतीय विरोधी रुख सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है।

चुनाव प्रचार के दौरान मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने एक बार फिर अपने पुराने आक्रामक अंदाज में उत्तर भारतीयों को निशाने पर लिया। उनके बयानों का उद्देश्य मूल मराठी मतदाताओं को एकजुट करना और खुद को बाल ठाकरे की विरासत का असली उत्तराधिकारी सिद्ध करना था। मुंबई, ठाणे, नासिक और छत्रपति संभाजीनगर जैसे शहरों में उत्तर भारतीयों की आबादी अब महज एक वोट बैंक नहीं, बल्कि एक निर्णायक सामाजिक-आर्थिक शक्ति है। इन चुनावों में एक दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिला। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के जमीनी कार्यकर्ता और कैडर तो पूरी तरह एकजुट रहे, लेकिन उन्हें समर्थन देने वाला बाहरी वर्ग छिटक गया। हालांकि, राज ठाकरे के तीखे बयानों ने इस पूरे किए-कराए पर पानी फेर दिया।

मुंबई और आसपास के महानगरों में करीब 25 से 30 फीसद मतदाता उत्तर भारतीय पृष्ठभूमि से आते हैं। कई वार्डों में इनकी संख्या इतनी प्रभावी है कि वे जीत-हार का फैसला करते हैं। ठाकरे भाइयों की अपेक्षित सफलता न मिलने का गणित सीधा है—मराठी वोटों का बँटवारा राज और उद्धव के बीच हो गया, जबकि गैर-मराठी (विशेषकर उत्तर भारतीय और गुजराती) वोट बैंक पूरी तरह से उनके खिलाफ एकजुट हो गया। यह एक ऐसी स्थिति थी जहाँ राज ठाकरे के बयानों ने मराठी वोट तो नहीं दिलाए, पर उत्तर भारतीय वोट निश्चित रूप से गंवा दिए।

इसी बात पर अपने जमाने की सुपरहिट फिल्म जॉनी मेरा नाम का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था इंदीवर ने और संगीत में ढाला था कल्याण जी आनंद जी ने। इसे किशोर कुमार ने अपना स्वर दिया था। इस गीत को उस दौर के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माया गया था। गीत के बोल इस तरह हैं।

नफरत करने वालों के दिलों में प्यार भर दूँ

नफरत करने वालों के दिलों में प्यार भर दूँ

मैं वो साज़ हूँ, जो नफरत के तार भर दूँ

नफरत करने वालों के दिलों में प्यार भर दूँ

दुनिया की गलियों में मैं ही बदनाम हूँ

सच है कि मैं एक मामूली इंसान हूँ

लेकिन फिर भी ये मेरा दावा है

दुश्मन के सीने में भी यार भर दूँ

नफरत करने वालों के दिलों में प्यार भर दूँ…

खुद जलता हूँ, औरों को मैं रोशनी देता हूँ

जो भी मिले खुशियाँ उसे, बस ये दुआ देता हूँ

मुझको मिला जो जहर, उसे अमृत बना दूँ

मैं पतझड़ में भी फूलों की बहार भर दूँ

नफरत करने वालों के दिलों में प्यार भर दूँ…

किसके लिए दुनिया ने ये दीवार बनाई है

बंदे से जुदा करने को खुदा की खुदाई है

इन्सानियत के नाम पे, इंसान जाग उठे

ऐसी मैं रूहों में ललकार भर दूँ

नफरत करने वालों के दिलों में प्यार भर दूँ…

यह चुनाव ठाकरे भाइयों के लिए एक सबक है। बाल ठाकरे के दौर में राजनीति एकध्रुवीय थी, जहाँ उनका एक आदेश पत्थर की लकीर होता था। आज महाराष्ट्र की राजनीति बहुध्रुवीय है। एक तरफ भाजपा का मजबूत संगठनात्मक ढांचा है, तो दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे की शिवसेना का व्यावहारिक रुख। ऐसे में ठाकरे ब्रांड के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने की है।

उद्धव ठाकरे की मृदु हिंदुत्व और राज ठाकरे की कट्टर मराठी अस्मिता के बीच तालमेल की कमी ने समर्थकों को भ्रमित किया है। यदि ठाकरे परिवार को अपनी खोई हुई जमीन वापस पानी है, तो उन्हें यह समझना होगा कि आधुनिक महाराष्ट्र की पहचान अब केवल विरोध पर नहीं, बल्कि समावेश पर टिकी है।

नगर निकाय चुनावों के ये नतीजे चेतावनी हैं। राज ठाकरे के उत्तर भारतीय विरोधी बयानों ने शिवसेना के समावेशी होने के दावों की हवा निकाल दी। राजनीति में एकजुटता केवल कार्यकर्ताओं की भीड़ से नहीं, बल्कि मतदाताओं के विश्वास से आती है। जब तक ठाकरे भाई उत्तर भारतीय और अन्य समुदायों के मन से डर और असुरक्षा की भावना को नहीं निकालते, तब तक उनके लिए सत्ता का मार्ग कांटों भरा ही रहेगा। तब तक और कुछ नहीं तो नफरत करने वालों को प्यार जताते रहिए।