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बंगाल के चुनाव का असर देश की राजनीति पर भी

मौका देख चौका लगाया चाहेंगे कई दल

  • परिणाम पर दूसरे दलों की नजर लगी है

  • भाजपा की हार यानी मोदी का ग्राफ नीचे

  • जीते तो ममता बड़ी नेता के तौर पर होंगी

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः सोमवार, 4 मई को जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होंगे, तो वे केवल कोलकाता के नबन्ना (राज्य सचिवालय) की सत्ता का भविष्य तय नहीं करेंगे। ये नतीजे भारत की राजनीतिक दिशा और नरेंद्र मोदी युग के दूसरे पड़ाव की भावी तस्वीर भी साफ करेंगे। यह चुनाव महज एक राज्य की जीत-हार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाला है।

पश्चिम बंगाल की 294 सीटों के लिए दो चरणों  में मतदान हुआ। फालता सीट पर शनिवार को चुनाव स्थगित होने के बावजूद, राज्य में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था रही। 2,100 से अधिक अर्धसैनिक बलों की कंपनियों की निगरानी में करीब 92 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो बंगाल के हालिया इतिहास में दुर्लभ है।

पूरा चुनाव अभियान पहचान की राजनीति, नौकरियों, औद्योगिक विकास, महिला सुरक्षा और तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षों के शासन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। विशेष रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और नागरिकता जैसे विवादों ने ध्रुवीकरण को और गहरा किया।

भाजपा के लिए बंगाल उसकी अंतिम सीमा जैसा है। 2014 में केवल दो सीटों से शुरू हुआ सफर 2019 में 18 लोकसभा सीटों तक पहुँचा। यदि भाजपा इस बार जीतती है, तो यह उत्तर प्रदेश के पूर्व में उसके भगवा मानचित्र को पूर्ण कर देगा। 71 वर्षीय ममता बनर्जी, जो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का एक मजबूत चेहरा रही हैं, उनकी हार उन्हें एक रणनीतिकार के बजाय केवल एक सर्वाइवर (जीवित रहने के लिए संघर्ष करने वाली) बना देगी।

भाजपा की जीत नागरिकता, सीमा सुरक्षा और हिंदू ध्रुवीकरण के उसके मॉडल पर मुहर लगा देगी, जिसे भविष्य में अन्य राज्यों में भी दोहराया जा सकता है। अगर ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने में सफल रहती हैं, तो यह संदेश जाएगा कि मजबूत कल्याणकारी योजनाओं और क्षेत्रीय पहचान के दम पर भाजपा की विशाल मशीनरी को रोका जा सकता है।

एक जीत ममता के उस दावे को सच साबित करेगी कि 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम भाजपा की विस्तारवादी राजनीति की सीमा थे, न कि कोई इत्तेफाक।

लेकिन असली गंभीर मुद्दा इससे हटकर है क्योंकि अगर भाजपा बंगाल का चुनाव हार जाती है तो एन चंद्राबाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे सहयोगी अपने समर्थन पर दोबारा विचार करने पर मजबूर हो जाएंगे। दूसरी तरफ भाजपा के अंदर भी मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व के अब खत्म होने का एलान हो जाएगा।

वैसी स्थिति में संसद और पार्टी दोनों मोर्चों पर मोदी और शाह की जोड़ी को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। एक मजबूत जनादेश चाहे जिसके पक्ष में आए, वह भारत की राजनीति का अगला अध्याय लिखेगा। वहीं, एक मजबूर या खंडित जनादेश विपक्ष को और कमजोर कर सकता है और केंद्र के सामने राज्य की स्थिति को अस्थिर बना सकता है।