राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा और वैचारिक पतन
आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना केवल दल-बदल की एक घटना नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे सफल राजनीतिक स्टार्ट-अप के भीतर गहरे तक समा चुके वैचारिक क्षरण को दर्शाता है। यद्यपि इन सात सदस्यों के पलायन से उत्पन्न दृश्य पार्टी के लिए विचलित करने वाले हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि अपने शैशवकाल से ही आप ने इस तरह के संकटों का सामना किया है।
अपने अस्तित्व के पहले तीन वर्षों के भीतर ही पार्टी ने निष्कासन और इस्तीफों के माध्यम से अपने कई प्रमुख संस्थापक सदस्यों को खो दिया था। इसके बावजूद, यह एक दशक के भीतर एक राष्ट्रीय पार्टी बनने में सफल रही। हालाँकि, इस समय सीमा में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह यह है कि आम आदमी पार्टी अब उस वैकल्पिक राजनीति के वादे का प्रतिनिधित्व नहीं करती, जिसका उसने जन्म के समय दावा किया था।
आज यह एक अन्य पारंपरिक राजनीतिक दल की तरह दिखाई देती है, जो उन्हीं फोस्टियन सौदों (नैतिकता की बलि देकर सत्ता पाना) में लिप्त है, जिनके खिलाफ उसने कभी आवाज़ उठाई थी। विडंबना यह है कि आप से मोहभंग का मुख्य कारण वही व्यक्ति है जिसे पार्टी का सबसे मजबूत पत्ता माना जाता है—अरविंद केजरीवाल की छवि और उनका व्यावहारिक दृष्टिकोण।
एक के बाद एक कई राज्यों को जीतने की उनकी तीव्र महत्त्वाकांक्षा ही पार्टी को इस वर्तमान संकट के मुहाने पर ले आई है। भाजपा में शामिल होने वाले सात सदस्यों में से चार पंजाब के वे समृद्ध व्यवसायी हैं, जिन्हें राजनीति में मनीबैग कहा जाता है। स्पष्ट रूप से, उन्हें राज्यसभा की सीटें इसलिए दी गई थीं ताकि वे 2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए आवश्यक वित्तीय शक्ति पार्टी को प्रदान कर सकें।
आप ने पहले भी इसी तरह की जल्दबाजी दिखाई थी, जिसका किसी न किसी बिंदु पर उल्टा पड़ना तय था। वैसे यह याद रखना होगा कि पार्टी के गठन के वक्त केजरीवाल ने एक बात कही थी कि तमाम राजनीतिक दलों को असली राजनीति करना वह बता देंगे। इस लिहाज से उनका प्रयास अब तक सफल रहा है। इन सात सदस्यों के पलायन और उसके बाद भाजपा में उनके विलय ने उच्च सदन (राज्यसभा) में भाजपा को और मजबूत कर दिया है।
हालाँकि, आम आदमी पार्टी ने संकेत दिया है कि वह दल-बदल विरोधी कानून का हवाला देते हुए इस विलय को अदालत में चुनौती देगी, लेकिन राजनीतिक नुकसान की भरपाई कानूनी लड़ाई से संभव नहीं दिखती। पार्टी के लिए इससे भी बड़ी चिंता पंजाब में उसकी भगवंत सिंह मान सरकार पर मंडराता साया है। राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि यह पलायन पंजाब में ऑपरेशन लोटस की शुरुआत हो सकता है।
आप के लिए दूसरा चिंताजनक विषय इसकी संगठनात्मक संस्कृति में आया कथित बदलाव है। कांग्रेस की पुरानी परंपरा और नरेंद्र मोदी-अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा की तरह, आम आदमी पार्टी भी अब हाई कमांड संस्कृति की गिरफ्त में है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। सामूहिक नेतृत्व के प्रारूप के साथ शुरू हुई यह पार्टी अब उन एक व्यक्ति केंद्रित दलों की प्रतिकृति बन गई है, जो भारतीय राजनीति में पहले से ही व्याप्त हैं।
पार्टी के भीतर सत्ता के इस केंद्रीकरण ने इसके मूल सामूहिक चरित्र को नष्ट कर दिया है। जब दिल्ली आबकारी नीति घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री जेल में थे, तब पार्टी ने राजनीतिक बागडोर संभालने के लिए केजरीवाल की पत्नी को आगे कर दिया। इससे पहले, पार्टी के संविधान में संशोधन किया गया ताकि केजरीवाल अनिश्चित काल तक राष्ट्रीय संयोजक बने रह सकें।
आम आदमी पार्टी के लिए यह आत्ममंथन का समय है। क्या सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण और नैतिकता की कीमत पर विस्तार की नीति ही इस संकटों के समुद्र का कारण है? जब किसी पार्टी का मूल आधार वैचारिक शुचिता हो, तो सत्ता के लिए किया गया कोई भी समझौता उसके अस्तित्व के लिए घातक सिद्ध होता है।
पंजाब के वित्तीय रूप से सशक्त सदस्यों का टूटना यह साबित करता है कि जब पद योगदान के आधार पर खरीदे या बेचे जाते हैं, तो उनमें निष्ठा का अभाव होता है। आज आप उसी दोराहे पर खड़ी है जहाँ से उसने कभी कांग्रेस और भाजपा को चुनौती दी थी। यदि पार्टी ने समय रहते अपने आंतरिक लोकतंत्र को बहाल नहीं किया और वैकल्पिक राजनीति के अपने मूल स्वरूप की ओर नहीं लौटी, तो यह भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक और अवसरवादी दल बनकर रह जाएगी। एक अनुत्तरित सवाल यह भी है कि तमाम पढ़े लिखे लोगों का यह खेमाबदल किसी और बड़ी घटना की नींव रखने जैसी नई शुरूआत तो नहीं है, जिसका अंदाजा भाजपा नहीं लगा पायी है।