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टेंडर सिंडिकेट पर शिकंजा: प्रशासनिक तंत्र की परीक्षा बन गया

रिशु श्री प्रकरण: क्या अब खुलेंगे सत्ता और सिस्टम के छिपे चेहरे?

  • एडीजी पंकज कुमार दाराद ने पहल की है

  • सीबीआई जांच से सरकार का परहेज क्यों

  • कई नामों का खुलासा तो पहले से हुआ

दीपक नौरंगी

पटनाः बिहार में चर्चित ‘टेंडर माफिया’ रिशु श्री प्रकरण अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की जड़ों तक पहुंच गया है। स्पेशल विजिलेंस यूनिट द्वारा की जा रही कार्रवाई में वित्त विभाग के संयुक्त सचिव मुमुक्षु चौधरी, नगर विकास विभाग के अभियंता उमेश कुमार सिंह और भवन निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता तारिणी दास की गिरफ्तारी ने पूरे प्रशासनिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया है। इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जांच के दौरान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस का नाम भी चर्चा में है, जिससे प्रशासनिक तंत्र में बेचैनी बढ़ गई है।

जांच एजेंसियों द्वारा की गई छापेमारी में करोड़ों रुपये की नकदी, महत्वपूर्ण दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वित्तीय लेन-देन के व्यापक रिकॉर्ड बरामद हुए हैं। रिशु श्री पर आरोप है कि उसने अपने परिजनों, कर्मचारियों और करीबियों के नाम पर फर्जी कंपनियां बनाकर सरकारी टेंडरों और ठेकों की व्यवस्था में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। यह नेटवर्क न केवल वित्तीय अनियमितताओं का अड्डा बना, बल्कि इसने शासन और प्रशासन की निगरानी प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

इस मामले की संवेदनशीलता और इसमें शामिल बड़े अधिकारियों की संलिप्तता को देखते हुए मांग उठ रही है कि इसे सीबीआई के हवाले कर देना चाहिए। चूंकि इसमें उच्च स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों और संभावित राजनीतिक संपर्कों की भूमिका की चर्चा है, इसलिए केवल राज्य स्तरीय जांच काफी नहीं हो सकती। केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा की गई निष्पक्ष जांच ही इस पूरे सिंडिकेट का पर्दाफाश कर सकती है और यह सुनिश्चित कर सकती है कि इसमें शामिल कोई भी रसूखदार व्यक्ति कानून की पकड़ से बाहर न रहे।

बिहार सरकार, जो लंबे समय से अपने ‘सुशासन’ और पारदर्शिता के मॉडल का दावा करती रही है, के लिए यह प्रकरण एक बड़ी राजनीतिक और नैतिक चुनौती बनकर उभरा है। विपक्ष ने इसे सरकार की विफलता बताते हुए निशाना साधना शुरू कर दिया है। फिलहाल, जनता की नजरें जांच एजेंसियों पर टिकी हैं। यह प्रकरण केवल टेंडर माफिया के खात्मे का नहीं, बल्कि शासन में जनता के टूटते भरोसे को पुनः बहाल करने की भी परीक्षा है। यह देखना शेष है कि जांच की आंच केवल निचले स्तर की गिरफ्तारियों तक सिमट कर रह जाएगी या फिर उन तमाम सफेदपोशों तक पहुंचेगी, जिन्होंने इस नेटवर्क को संरक्षण देकर ताकत प्रदान की।