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उच्च न्यायालय के नये निर्देश से पत्थर उद्योग पर संकट

उद्योग संघ की बैठक में इस पर चिंता जतायी

  • कर्ज लेकर स्थापित किया उद्योग

  • ट्रक चालक और मजदूर बेकार होंगे

  • मुख्यमंत्री से मिलने का फैसला हुआ

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड का पत्थर खनन और क्रशर उद्योग इस समय एक गंभीर कानूनी और नीतिगत संकट के दौर से गुजर रहा है। रांची के बिरसा विहार में झारखंड राज्य पत्थर उद्योग संघ की एक आपात बैठक हुई, जिसमें राज्यभर के पट्टाधारियों और व्यवसायियों ने हिस्सा लिया। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु झारखंड उच्च न्यायालय में लंबित एक जनहित याचिका और उसके बाद उपजी तकनीकी बाध्यताएं रहीं।

बैठक में साहिबगंज से आए संघ के अध्यक्ष बंदेश्वर प्रसाद सिंह ने बताया कि उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में अब खनन पट्टों और क्रशर इकाइयों के लिए नए नियम लागू किए जा रहे हैं। इसके तहत वन सीमा से दूरी को अनिवार्य रूप से 400 मीटर और दो इकाइयों के बीच की दूरी को 500 मीटर रखने का प्रावधान किया गया है। इस बदलाव के कारण राज्य की अधिकांश इकाइयों के सहमति पत्र पर रोक लग गई है, जिससे उत्पादन ठप होने की कगार पर है।

व्यवसायियों का कहना है कि साल 2015 से पहले दूरी का मानक 500 मीटर था, जिसे राज्य सरकार ने बाद में घटाकर 250 मीटर कर दिया था। इसी छूट के आधार पर सैकड़ों उद्यमियों ने करोड़ों रुपये का निवेश किया और भारी भरकम बैंक ऋण लेकर अपनी इकाइयां स्थापित कीं। अब अचानक नियमों के पुराने ढर्रे पर लौटने से इन निवेशकों के सामने दिवालिया होने की स्थिति पैदा हो गई है। संघ का अनुमान है कि यदि इन नियमों में ढील नहीं दी गई, तो राज्य की 60 से 80 प्रतिशत खदानें और क्रशर स्थायी रूप से बंद हो सकते हैं।

लोग मान रहे हैं कि पत्थर उद्योग के इस संकट का असर बहुआयामी होगा। हजारों मजदूरों और ट्रक चालकों की आजीविका पर सीधा प्रहार होगा।खदानें बंद होने से राज्य सरकार को मिलने वाली करोड़ों रुपये की रॉयल्टी और टैक्स का नुकसान होगा। गिट्टी और पत्थरों की कमी होने से बाजार में कीमतें बढ़ेंगी, जिससे आम जनता के घरों का बजट और सरकारी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रभावित होंगी।

बैठक में उपाध्यक्ष अनिल सिंह और व्यवसायी नितेश सारदा ने उच्च रॉयल्टी दरों को भी उद्योग के लिए बोझ बताया। अंत में यह सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि उद्योग को बचाने के लिए संघ का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही मुख्यमंत्री से मुलाकात करेगा। वे सरकार से नियमों में आवश्यक संशोधन करने और उच्च न्यायालय में उद्योग का पक्ष मजबूती से रखने की अपील करेंगे, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बना रहे।