झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अब हुई औपचारिक घोषणा
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दूसरे लोगों की जगह खा गये लोग
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पार्टी में अभी लौटे और वीआईपी बने
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वन मैन आर्मी वाले लोगों को तरजीह
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की हालिया घोषणा ने संगठन के भीतर एक नई बहस और असंतोष को जन्म दे दिया है। नई कमेटी के गठन के साथ ही एक बार फिर ‘परिवारवाद‘ का जिन्न बाहर निकल आया है। सूची का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने योग्यता और जमीनी पकड़ के बजाय पारिवारिक संबंधों को प्राथमिकता दी है।
एक ही परिवार के कई सदस्यों को महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने के फैसले ने उन पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को आहत किया है, जो दशकों से पार्टी का झंडा थामे हुए हैं। यद्यपि औपचारिक तौर पर अभी किसी ने विद्रोह का बिगुल नहीं फूंका है, लेकिन अनौपचारिक चर्चाओं में यह टीस साफ दिख रही है कि अगर परिवार विशेष के बजाय ऊर्जावान युवाओं और पुराने संघर्षशील साथियों को मौका मिलता, तो राज्य में संगठन का विस्तार कहीं अधिक प्रभावी ढंग से हो पाता।
संगठनात्मक ढांचे में केवल परिवारवाद ही नहीं, बल्कि वरीयता क्रम की अनदेखी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कमेटियों में नामों के चयन और उनके क्रम ने वरिष्ठ नेताओं को असहज कर दिया है। उदाहरण के तौर पर, उपाध्यक्षों की सूची में अभिलाष साहू का नाम सबसे ऊपर रखा गया है, जबकि खूंटी के सांसद और बेहद अनुभवी कांग्रेसी नेता कालीचरण मुंडा को उनके नीचे स्थान दिया गया है।
प्रोटोकॉल की यह चूक कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश दे रही है। इसके अतिरिक्त, दल-बदल की राजनीति से लौटे नेताओं को जिस तरह प्रीमियम ट्रीटमेंट दिया जा रहा है, उसने पार्टी के भीतर निष्ठा के पैमाने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदित्य विक्रम जयसवाल, जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे और वहां से वापस लौटे, उन्हें कुछ ही दिनों के भीतर महासचिव जैसा महत्वपूर्ण पद सौंप दिया गया है। वहीं, कई पुराने और वफादार पदाधिकारियों का डिमोशन कर उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है।
पार्टी के भीतर विरोधाभासों का आलम यह है कि एक ओर योगेंद्र साव को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ बयानबाजी के आरोप में पार्टी से निष्कासित किया जाता है, तो दूसरी ओर डैमेज कंट्रोल के लिए उनकी पुत्री अंबा प्रसाद को कमेटी में अहम जगह दी जाती है। यह दोहरा मापदंड पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाता है।
पूरी सूची में ऐसे चेहरों की भरमार है जिन्हें वन मैन आर्मी कहा जा रहा है; यानी वे नेता जो कागजों पर तो पदधारी हैं, लेकिन जमीन पर एक दर्जन समर्थक जुटाने की क्षमता भी नहीं रखते। साथ ही, कई ऐसे बुजुर्ग और शारीरिक रूप से अक्षम सदस्यों को कुर्सियां दी गई हैं, जो सक्रिय राजनीति की दौड़ में पीछे छूट चुके हैं। ऐसे में यह आशंका प्रबल हो गई है कि आगामी चुनावों से पहले संगठन को मजबूत करने का यह प्रयास कहीं आत्मघाती साबित न हो जाए।