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आरोपी को आत्मसमर्पण का निर्देश नहीं दे सकते

अग्रिम जमानत के निर्देशों पर शीर्ष अदालत का बड़ा फैसला

  • अग्रिम जमानत खारिज करने का अधिकार

  • आत्मसमर्पण का निर्देश नहीं दे सकते

  • झारखंड से जुड़ा हुआ है यह मामला

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते समय किसी भी अदालत के पास आरोपी को निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश देने का अधिकार क्षेत्र नहीं है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, यदि अदालत अग्रिम जमानत खारिज करना चाहती है, तो वह ऐसा कर सकती है, लेकिन अदालत को यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता अब आत्मसमर्पण करे।

यह मामला झारखंड उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा था। उच्च न्यायालय ने धोखाधड़ी और जालसाजी के एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी और उसे आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत मांगने का निर्देश दिया था। यह विवाद 2021 में दर्ज एक निजी शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें जमीन विवाद को लेकर मारपीट (धारा 323), धोखाधड़ी (धारा 420) और जालसाजी (धारा 467, 468, 471) जैसे आरोप लगाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कानूनी प्रक्रिया की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए उच्च न्यायालयों, विशेषकर बिहार और झारखंड के अदालती चलन पर कड़ा रुख अपनाया है।शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कोई अदालत अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज करती है, तो उसका कार्य वहीं समाप्त हो जाता है। आरोपी को सरेंडर करने के लिए मजबूर करना अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 202 के तहत जांच के दौरान भी, पुलिस के पास आरोपी को गिरफ्तार करने की शक्ति नहीं होती, जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी न किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी (1973) की धारा 87 का हवाला देते हुए बताया कि एक मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के बाद सामान्य प्रक्रिया समन जारी करने की होती है। वारंट केवल तभी जारी किया जा सकता है जब अदालत के पास यह मानने का कारण हो कि आरोपी फरार हो गया है या समन का पालन नहीं करेगा। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि आरोपी को केवल अदालत के सामने उपस्थित होने और कार्यवाही में भाग लेने की आवश्यकता होती है।

पीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में अग्रिम जमानत याचिकाएं नियमित रूप से दायर की जा रही हैं, जबकि उनकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप अनावश्यक मुकदमेबाजी उच्चतम न्यायालय तक पहुँच रही है। कोर्ट ने कहा, मुकदमों का बोझ बेवजह बढ़ रहा है और याचिकाकर्ताओं को देश की सबसे बड़ी अदालत तक का सफर तय करना पड़ता है।

चूंकि इस मामले में ट्रायल पहले से ही चल रहा था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कोई नया आदेश जारी करने के बजाय याचिका का निपटारा कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस आदेश की प्रतियां बिहार और झारखंड के उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसे संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखा जा सके और भविष्य में इस तरह की बिना अधिकार क्षेत्र वाली गलतियों को रोका जा सके।