सीएजी की रिपोर्ट पर सरकार की चुप्पी से बढ़ा संदेह
-
उपयोगिता प्रमाण पत्र मौजूद नहीं है
-
कई रकम गलत खातों में दर्ज हुए हैं
-
यह सरकारी निगरानी की विफलता है
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की हालिया रिपोर्ट ने देश के वित्तीय गलियारों में हलचल मचा दी है। अप्रैल 2026 की शुरुआत में संसद में पेश की गई इस रिपोर्ट में 54,282.32 करोड़ रुपये के बेहिसाब खर्च को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद विपक्षी दलों, विशेष रूप से माकपा की तेलंगाना इकाई और विभिन्न मीडिया प्लेटफार्मों ने केंद्र सरकार की वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर हमला तेज कर दिया है। हालांकि, केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई विस्तृत या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे राजनीतिक गलियारों में संदेह और चर्चाएं और तेज हो गई हैं।
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, 54,282.32 करोड़ रुपये की यह भारी-भरकम राशि 33,973 लंबित उपयोग प्रमाणपत्रों से संबंधित है। ये प्रमाणपत्र 15 अलग-अलग मंत्रालयों में लंबित हैं, जिसका अर्थ है कि सरकारी योजनाओं के लिए जारी किए गए धन के अंतिम उपयोग को औपचारिक रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन बड़े क्षेत्रों को रेखांकित किया गया है:
इसके अलावा, ऑडिट में वित्तीय प्रबंधन की अन्य गंभीर खामियां भी उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 12,754 करोड़ की राशि को गलत वित्तीय शीर्षों के तहत वर्गीकृत किया गया था। साथ ही, 9,222 करोड़ की लेवी को निर्धारित समय सीमा के भीतर स्थानांतरित नहीं किया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ उपयोग प्रमाणपत्र वर्ष 1985 जितने पुराने हैं, जो वित्तीय रिपोर्टिंग प्रणालियों में दशकों पुराने अनुपालन अंतर की ओर इशारा करते हैं।
सामान्य वित्तीय नियमों के तहत उपयोग प्रमाणपत्र अनिवार्य होते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जारी किया गया सार्वजनिक धन वास्तव में उसी उद्देश्य के लिए खर्च हुआ है जिसके लिए उसे आवंटित किया गया था। 19 अप्रैल को माकपा तेलंगाना इकाई ने इसे जवाबदेही की एक बड़ी विफलता करार देते हुए आरोप लगाया कि केंद्रीय योजनाओं के तहत बड़ी मात्रा में धन का हिसाब नहीं मिल रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबित उपयोग प्रमाणपत्रों से जुड़े ऑडिट अवलोकन अक्सर दस्तावेजों के प्रबंधन में देरी या प्रक्रियाओं की कमी का संकेत देते हैं। इसका मतलब सीधे तौर पर धन का गबन नहीं होता, लेकिन यह सार्वजनिक वित्त की निगरानी और रिपोर्टिंग प्रणाली में गंभीर अंतराल को जरूर दर्शाता है।