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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने खेडा की याचिका खारिज की

कांग्रेस नेता को गुवाहाटी की अदालत से राहत नहीं

  • सीएम की पत्नी का मामला है यह

  • अब पुलिस गिरफ्तार कर सकती है

  • अनर्गल आरोप राजनीति के तहत है

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटीः गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा को एक बड़ा कानूनी झटका देते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी, रिनिकी भूइयां शर्मा द्वारा दर्ज कराई गई एक प्राथमिकी से संबंधित है। रिनिकी भूइयां शर्मा ने असम पुलिस की अपराध शाखा में खेड़ा के खिलाफ मानहानि और गलत सूचना फैलाने के गंभीर आरोप लगाए हैं।

यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस वार्ता के दौरान सार्वजनिक रूप से यह दावा किया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास एक से अधिक पासपोर्ट हैं और उन्होंने विदेशों में अघोषित संपत्ति जमा कर रखी है। इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और छवि बिगाड़ने वाला बताते हुए रिनिकी शर्मा ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि खेड़ा के बयान न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हैं, बल्कि उनके और उनके परिवार के सम्मान को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से दिए गए हैं।

इससे पहले, 21 अप्रैल को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति की पीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान, सरकारी पक्ष और रिनिकी भूइयां शर्मा के वकीलों ने तर्क दिया कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा बिना किसी ठोस सबूत के इस तरह के संवेदनशील आरोप लगाना समाज में गलत संदेश देता है और यह जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। वहीं, खेड़ा की कानूनी टीम ने तर्क दिया था कि यह राजनीतिक प्रतिशोध का मामला है और वे केवल सार्वजनिक सूचनाओं के आधार पर सवाल उठा रहे थे।

शुक्रवार को अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया, जिसका अर्थ है कि अब असम पुलिस की अपराध शाखा के पास पवन खेड़ा से पूछताछ करने या आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हिरासत में लेने का कानूनी विकल्प खुला है। असम पुलिस पहले भी पवन खेड़ा के खिलाफ अन्य मामलों में सक्रिय रही है, जिससे इस ताजा घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति और कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। कांग्रेस पार्टी ने इस अदालती आदेश पर चिंता व्यक्त की है, जबकि भाजपा समर्थकों ने इसे कानून की जीत बताया है।