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इस एक गांव में सिर्फ तीन ही वोट पड़े

पूरे तमिलनाडु में पहले से बेहतर मतदान के बीच बुरी खबर

  • प्रशासन का अनुरोध काम नहीं आया

  • काफी समय से वहां तनाव की हालत है

  • वोट देने दो पुरुष और एक महिला ही पहुंची

राष्ट्रीय खबर

चेन्नईः तमिलनाडु में जहां एक ओर लोकतंत्र का उत्सव भारी मतदान के रूप में मनाया जा रहा है, वहीं तिरुनेलवेली जिले के एक छोटे से गांव ने इस चुनावी प्रक्रिया को मूक विरोध के मंच में बदल दिया। तिरुनेलवेली जिले के पेरुमपथु गांव के लगभग सभी मतदाताओं ने गुरुवार को चुनाव का पूर्ण बहिष्कार किया। जिले की औसत मतदान दर जहां 77.69 प्रतिशत दर्ज की गई, वहीं 969 मतदाताओं वाले इस गांव में मतदान केंद्र पर केवल तीन लोग—एक पुरुष और दो महिलाएं—वोट डालने पहुंचे। यह घटनाक्रम जिले के अन्य हिस्सों में देखी गई चुनावी हलचल के बिल्कुल विपरीत रहा।

पेरुमपथु गांव, जो तिरुनेलवेली से लगभग 25 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है, का यह बहिष्कार किसी आकस्मिक कारण से नहीं, बल्कि पिछले माह हुई एक दर्दनाक और हिंसक घटना के प्रति गहरे आक्रोश का परिणाम था। मार्च में हथियारों से लैस एक बेखौफ गिरोह ने गांव में आतंक मचाया था, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी और सात अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। यह गांव लंबे समय से जातिगत हिंसा के प्रति संवेदनशील रहा है, और इस ताजा हमले ने ग्रामीणों के धैर्य की सीमा पार कर दी।

हालांकि जिला प्रशासन और पुलिस ने हिंसा के बाद कुछ कार्रवाई की थी, लेकिन ग्रामीणों ने इसे केवल अधिकारियों द्वारा अपनी छवि बचाने का फॉर्मूला करार दिया। बार-बार होने वाली हिंसा और सुरक्षा की कमी से तंग आकर ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि वे इस बार लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेंगे। उनका मानना है कि जब व्यवस्था उनकी जान-माल की रक्षा करने में विफल रही है, तो उन्हें वोट देने का भी कोई औचित्य नजर नहीं आता।

बहिष्कार की सूचना मिलते ही तिरुनेलवेली के जिला कलेक्टर और चुनाव अधिकारी सुकुमार तुरंत गांव पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों के साथ सुलह वार्ता की और उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए मनाने की कोशिश की। इसके बावजूद, ग्रामीण अपनी जिद पर अड़े रहे। यह बहिष्कार उस प्रशासनिक और सुरक्षा तंत्र के प्रति एक कड़ा संदेश है, जिसे ग्रामीण अपनी रक्षा करने में असमर्थ मानते हैं। पूरे जिले में जहां मतदान का उत्साह था, पेरुमपथु में पसरा सन्नाटा लोकतंत्र की उन खामियों को उजागर कर रहा था, जहां नागरिक खुद को असुरक्षित पाकर मुख्यधारा से कटने को मजबूर हो जाते हैं।