मानवीय पीड़ा का मूकदर्शक नहीं रह सकता राज्य
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कोविड-19 टीकाकरण के गंभीर प्रतिकूल प्रभावों के लिए एक बिना गलती के दायित्व मुआवजा नीति तैयार करे। न्यायालय ने कहा कि संविधान राज्य को कल्याण और गरिमा के सक्रिय संरक्षक के रूप में देखता है, न कि मानवीय पीड़ा के मूकदर्शक के रूप में।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि महामारी के दौरान सरकार ने टीकाकरण योजना के माध्यम से अनगिनत जानें बचाईं, लेकिन साथ ही सरकारी आंकड़े यह भी बताते हैं कि इन टीकों के कारण कुछ लोगों की जान भी गई। ऐसी स्थिति में, राज्य उन परिवारों की सहायता करने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वास्थ्य की रक्षा और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने का राज्य का सकारात्मक दायित्व भी शामिल है।
न्यायालय ने कहा कि नो-फॉल्ट मुआवजे का सिद्धांत भारतीय कानून के लिए नया नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों में भी ऐसी योजनाएं मौजूद हैं। इसमें पीड़ित को लापरवाही साबित करने के कठिन बोझ से मुक्ति मिलती है। अदालत ने माना कि टीकाकरण के बाद होने वाली प्रतिकूल घटनाओं (AEFI) के वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए मौजूदा निगरानी तंत्र पर्याप्त है, इसलिए किसी नए विशेषज्ञ निकाय की आवश्यकता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को इस नीति को जल्द तैयार करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि इस नीति का अर्थ यह नहीं लगाया जाएगा कि केंद्र सरकार ने अपनी किसी गलती या लापरवाही को स्वीकार किया है। यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है जिनमें आरोप लगाया गया था कि 2021 में कोविशील्ड की पहली खुराक लेने के बाद दो महिलाओं की मृत्यु हो गई थी। अदालत ने अंत में कहा कि निर्वाचित सरकार के पास नीतियां बनाने का अधिकार है, लेकिन जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो न्यायपालिका मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती।