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डीजीपी नियुक्ति के लिए कानून का पालन करें

अपने पुराने फैसले पर ही टिकी है देश की शीर्ष अदालत

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि जिन राज्यों ने पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति के लिए अपना अलग अधिनियम बनाया है, उन्हें उसी कानून का पालन करना होगा। हालांकि, जिन राज्यों में ऐसा कोई कानून नहीं है, उन्हें शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के खिलाफ शुरू की गई अवमानना ​​कार्यवाही को बंद कर दिया, क्योंकि इन राज्यों ने यूपीएससी को डीजीपी की नियुक्ति के लिए नामों का प्रस्ताव भेज दिया है।

अदालत ने साफ किया कि प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए दिशा-निर्देश उन राज्यों पर लागू होंगे जिनके पास अपना कानून नहीं है। प्रकाश सिंह मामले के तहत राज्य को पात्र आईपीएस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजने होते हैं। यूपीएससी उनमें से तीन सबसे वरिष्ठ और उपयुक्त अधिकारियों का पैनल चुनकर राज्य को भेजता है। राज्य सरकार को उन तीन नामों में से एक को डीजीपी नियुक्त करना होता है, जिसका कार्यकाल न्यूनतम दो वर्ष तय होता है।

सुनवाई के दौरान जब पश्चिम बंगाल का मामला आया, तो सीजेआई सूर्यकांत ने चुटकी लेते हुए कहा, पश्चिम बंगाल की दिलचस्पी डीजीपी को राज्यसभा भेजने में अधिक है। उम्मीद है कि अब राज्य को एक स्थायी डीजीपी मिलेगा क्योंकि राज्यसभा में अब कोई रिक्ति नहीं है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस ने पूर्व डीजीपी राजीव कुमार को राज्यसभा के लिए नामित किया है।

झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने बताया कि उन्होंने डीजीपी की नियुक्ति के लिए अपना अलग कानून बना लिया है। झारखंड के कानून के अनुसार, चयन प्रक्रिया की अध्यक्षता उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है।

मामले में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने तर्क दिया कि डीजीपी, मुख्य सचिव और गृह सचिव जैसे पदों का चयन सीधे सत्तासीन सरकार द्वारा किया जाना चाहिए, न कि किसी विस्तृत पैनल द्वारा। उन्होंने कहा कि शासन चलाने के लिए सरकार का इन शीर्ष अधिकारियों पर भरोसा होना आवश्यक है। पीठ ने इस विचार से सहमति जताई कि नियुक्ति प्रक्रिया को बहुत अधिक विस्तृत नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने अब छत्तीसगढ़ और झारखंड सरकारों से डीजीपी की नियुक्ति पर दो सप्ताह में जवाब मांगा है। यूपीएससी ने भी चिंता जताई थी कि राज्यों द्वारा प्रस्ताव भेजने में देरी से योग्य अधिकारी चयन प्रक्रिया से वंचित रह जाते हैं और कई राज्य नियमित नियुक्ति के बजाय कार्यवाहक डीजीपी से काम चला रहे हैं।