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तर्कहीन और गलत निर्णय ले रहे हैः एम ए बेबी

माकपा के निशाने पर आये तमिलनाडु के राज्यपाल के फैसले

  • यह बहुमत सदन में साबित होता है

  • पूर्व के कई मामले इसके उदाहरण हैं

  • माकपा अब भी द्रमुक गठबंधन के साथ

राष्ट्रीय खबर

चेन्नई: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद उत्पन्न हुए राजनीतिक गतिरोध के बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने राज्यपाल के रुख पर कड़ा ऐतराज जताया है। माकपा के महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा कि तमिलगा वेत्री कड़गम के प्रमुख विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न करने का राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर का निर्णय पूरी तरह से तर्कहीन और असंवैधानिक है।

एम.ए. बेबी ने स्पष्ट किया कि माकपा अभी भी द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है और उन्होंने गठबंधन बदलने की किसी भी अटकल को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, हम मजबूती से द्रमुक गठबंधन के साथ हैं, जिसके तहत हमने दो सीटों पर जीत दर्ज की है। गुरुवार सुबह माकपा नेताओं ने निवर्तमान मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से मुलाकात की, जिसके बाद शुक्रवार को चेन्नई में वामपंथी दलों की एक और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है।

संवैधानिक परंपराओं का हवाला देते हुए बेबी ने तर्क दिया कि राज्यपाल का यह कर्तव्य है कि वह सबसे बड़े एकल दल के नेता को शपथ दिलाएं और उन्हें सदन के पटल पर बहुमत साबित करने के लिए उचित समय दें। उन्होंने 1996 का उदाहरण देते हुए कहा, मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी को 13 दिन का समय दिया गया था। राज्यपाल को भी यहाँ सबसे बड़े दल को आमंत्रित करना चाहिए, विशेषकर तब जब किसी अन्य गठबंधन ने औपचारिक रूप से सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया है।

तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में त्रिशंकु परिणाम आने के बाद राजनीतिक संकट गहरा गया है। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन वह बहुमत के आंकड़े से कुछ कदम दूर है। विजय ने 6 मई को राज्यपाल से दो बार मुलाकात की थी, जिसमें एक 40 मिनट की लंबी व्यक्तिगत चर्चा भी शामिल थी। हालांकि, राजभवन ने कथित तौर पर उन्हें सूचित किया कि टीवीके ने अभी तक सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या बल प्रदर्शित नहीं किया है।

दूसरी ओर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने भी चेन्नई से एक बयान जारी कर राज्यपाल की शक्तियों पर सवाल उठाए हैं। भाकपा ने एस.आर. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल संवैधानिक रूप से सबसे बड़े दल को बुलाने के लिए बाध्य हैं। वामपंथी दलों का मानना है कि बहुमत का परीक्षण राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर होना चाहिए।