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दर्जनों उपसमिति के बीच कार्यसमिति ही गायब

जंबोजेट कमेटी में पार्टी संविधान ही हो गया दरकिनार

  • बयानबाजी काफी तल्ख तेवर तक पहुंची

  • कई नेताओं का इस्तीफा भी होने लगा

  • फैसला कौन कमेटी लेगी इसका पता नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा हाल ही में पदाधिकारियों की नई सूची की घोषणा के बाद राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया है। इस घोषणा को राजनीतिक गलियारों में ततैये के छत्ते में पत्थर मारने के समान देखा जा रहा है, क्योंकि संगठन के भीतर का असंतोष अब सार्वजनिक विद्रोह का रूप ले चुका है। पार्टी के भीतर मचे इस घमासान ने न केवल नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए कांग्रेस की एकजुटता को भी दांव पर लगा दिया है।

सूची जारी होते ही राज्य सरकार में शामिल कांग्रेस के एक कद्दावर कैबिनेट मंत्री ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है। मंत्री के तीखे तेवरों ने संगठन में उनकी अनदेखी के संकेतों को हवा दी है। इस स्थिति को और गंभीर तब बना दिया गया जब मंत्री पद के अन्य दावेदार विधायकों ने भी मैदान में उतरकर मोर्चा संभाल लिया।

असंतुष्ट नेताओं ने कांग्रेस में होने और असली कांग्रेसी होने के बीच की परिभाषा पूछते हुए नेतृत्व को कटघरे में खड़ा किया है। नेताओं का तर्क है कि कई ऐसे चेहरों को तरजीह दी गई है जिनकी निष्ठा और योगदान संदेहास्पद है। दूसरी तरफ यह भी माना जा रहा है कि विधायक जी मौके देखकर खुद के मंत्री बनाने का रास्ता साफ करने में जुटे हैं।

संगठनात्मक दृष्टि से एक व्यावहारिक सवाल यह भी खड़ा हुआ है कि इतनी विशालकाय सूची—जिसमें सैकड़ों पदाधिकारियों के नाम शामिल हैं—के बैठने और कार्य करने का इंतजाम रांची स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में कैसे होगा? आलोचकों का कहना है कि पदों की यह रेवड़ी कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए बांटी गई है, न कि कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए। इसी बीच, कई पदाधिकारियों द्वारा इस्तीफे की झड़ी लगा देने से पार्टी की फजीहत और बढ़ गई है।

हालांकि, सबसे बड़ी तकनीकी और संवैधानिक खामी जो निकलकर सामने आई है, वह कार्यसमिति के गठन से जुड़ी है। कांग्रेस के संविधान के अनुसार प्रदेश कार्यसमिति ही निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई होती है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि प्रदेश कांग्रेस ने विभिन्न उप-समितियों में तो सैकड़ों नाम भर दिए, लेकिन मुख्य कार्यसमिति का विधिवत गठन करना ही भूल गई।

इसके चलते वर्तमान में झारखंड कांग्रेस के पास ऐसी कोई अधिकृत कमेटी नहीं बची है जो पार्टी के नीतिगत फैसलों पर मुहर लगा सके या वैधानिक रूप से रणनीति तैयार कर सके। बिना कार्यसमिति के इन नियुक्तियों और फैसलों की वैधता पर भी अब प्रश्नचिह्न लग गया है, जिससे संगठन एक गहरे संवैधानिक संकट में फंसता नजर आ रहा है।