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पिछले चार दशकों से डाक्टर और मरीज दोनों गलतफहमी में थे

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दिल की आम दवा बीटा ब्लॉकर्स बेअसर

  • यह दवा महिलाओं के लिए खतरनाक

  • अंतर्राष्ट्रीय परीक्षण में हुआ खुलासा

  • बदली चिकित्सा पद्धति में बेकार है यह

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दशकों से दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ने के बाद मरीजों को नियमित रूप से बीटा ब्लॉकर्स दवा दी जाती रही है। इसे दिल की रिकवरी का एक मानक हिस्सा माना जाता था। लेकिन वर्ष 2025 में हुए एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायल (नैदानिक परीक्षण) रीबूट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिन मरीजों को बिना किसी जटिलता के हार्ट अटैक आया है और जिनके दिल की कार्यप्रणाली (पंपिंग) अभी अच्छी है, उन्हें इस दवा से कोई लाभ नहीं मिल रहा है।

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यह महत्वपूर्ण अध्ययन माउंट सिनाई फस्टर हार्ट हॉस्पिटल के अध्यक्ष डॉ. वैलेंटाइन फस्टर के नेतृत्व में स्पेन और इटली के 109 अस्पतालों के 8,505 मरीजों पर किया गया। इसके निष्कर्ष द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन के दौरान लगभग चार वर्षों तक मरीजों की निगरानी की गई, जिससे पता चला कि इस दवा ने मृत्यु, दोबारा हार्ट अटैक या हार्ट फेलियर (दिल की विफलता) के जोखिम को कम नहीं किया।

विशेषज्ञों के अनुसार, बीटा ब्लॉकर्स उस दौर में मानक उपचार बने थे जब चिकित्सा तकनीक आज जितनी आधुनिक नहीं थी। आज के समय में बंद धमनियों को तुरंत खोल दिया जाता है और मरीजों को स्टेटिन तथा एंटीप्लेटलेट जैसी शक्तिशाली दवाएं दी जाती हैं।

इस आधुनिक उपचार के कारण दिल को होने वाला नुकसान और एरिथमिया (अनियमित धड़कन) जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा पहले ही बहुत कम हो जाता है। ऐसे में सुरक्षित हृदय कार्यप्रणाली वाले मरीजों के लिए बीटा ब्लॉकर्स की उपयोगिता प्रासंगिक नहीं रह गई है। वर्तमान में 80 प्रतिशत से अधिक मरीजों को अस्पताल से छुट्टी देते समय यह दवा लिखी जाती है, जिसे अब बंद करके अनावश्यक दवाओं के बोझ और उनके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।

इस शोध के एक उप-अध्ययन (सब-स्टडी), जो यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित हुआ, ने एक गंभीर चिंता पैदा की है। अध्ययन में देखा गया कि जिन महिलाओं के दिल की कार्यप्रणाली सामान्य थी (लेफ्ट वेंट्रिकुलर इजेक्शन फ्रैक्शन 50 प्रतिशत या अधिक), उन्हें बीटा ब्लॉकर्स देने पर मृत्यु या हार्ट फेलियर का खतरा उन महिलाओं की तुलना में 2.7 प्रतिशत अधिक पाया गया जिन्हें यह दवा नहीं दी गई थी। पुरुषों में ऐसा कोई बढ़ा हुआ जोखिम नहीं देखा गया।

रीबूट अकेला ऐसा परीक्षण नहीं है; वर्ष 2024 के रिड्यूस-एएमआई परीक्षण में भी यही बात सामने आई थी। हालांकि, कुछ अन्य शोध जैसे बीटामी-डैनब्लॉक और बाद के विश्लेषणों से पता चलता है कि यह दवा उन मरीजों के लिए अब भी बेहद जरूरी है जिनके दिल की कार्यप्रणाली कम (40 से 49 प्रतिशत इजेक्शन फ्रैक्शन) हो चुकी है।