प्रशांत महासागर में दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री अभयारण्य
पेरिसः आज सुबह प्रशांत महासागर के क्षितिज से पर्यावरण संरक्षण की एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। प्रशांत महासागर के द्वीप राष्ट्रों के एक शक्तिशाली संघ, जिसे ब्लू पैसिफिक अलायंस के नाम से जाना जाता है, ने आधिकारिक तौर पर दुनिया के सबसे बड़े समुद्री संरक्षित क्षेत्र की स्थापना की घोषणा की है। यह क्षेत्र इतना विशाल है कि इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर है—जो भौगोलिक रूप से मंगोलिया जैसे बड़े देश के कुल क्षेत्रफल के बराबर है।
पिछले 12 घंटों के भीतर हस्ताक्षरित इस ऐतिहासिक संधि के तहत, इस विशाल जलीय क्षेत्र को नो-गो ज़ोन में बदल दिया गया है। इसका अर्थ है कि अब यहां किसी भी प्रकार की व्यावसायिक मछली पकड़ने और गहरे समुद्र में खनन पर पूर्ण और कानूनी प्रतिबंध होगा। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में अनियंत्रित मछली पकड़ने और औद्योगिक गतिविधियों ने इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को विनाश के कगार पर पहुँचा दिया था।
यह संरक्षित क्षेत्र प्रशांत महासागर के उस हिस्से में स्थित है जिसे वैज्ञानिक ग्रेट ओशन रोडवे कहते हैं। यह समुद्री जीवों के प्रवास का एक प्रमुख मार्ग है। यहाँ टूना मछली की कई ऐसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं हैं। साथ ही, यहाँ विशाल और प्राचीन कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) मौजूद हैं, जो हजारों समुद्री प्रजातियों का घर हैं। समुद्री जीवविज्ञानियों का तर्क है कि बढ़ते वैश्विक तापमान, महासागरीय अम्लीकरण और प्लास्टिक प्रदूषण के इस दौर में, महासागरों की लचीलापन बनाए रखने के लिए ऐसे सुरक्षित क्षेत्रों का होना अनिवार्य है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठनों ने इसे पृथ्वी के लिए एक बड़ी जीत करार दिया है, लेकिन इसके आर्थिक पहलुओं पर बहस शुरू हो गई है। वैश्विक मछली पकड़ने वाले उद्योगों ने इस फैसले से होने वाले राजस्व के नुकसान पर गहरी चिंता जताई है। इसके जवाब में, ब्लू पैसिफिक अलायंस ने एक वैकल्पिक आर्थिक मॉडल पेश किया है।
अलायंस की योजना है कि इस क्षेत्र को इको-टूरिज्म (पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन) और टिकाऊ समुद्री अनुसंधान के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। इससे न केवल राजस्व की भरपाई होगी, बल्कि स्थानीय समुदायों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। यह कदम साबित करता है कि प्रकृति के संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना संभव है।