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शीर्ष अदालत के तेवर से परेशान सरकार

यह बात बहुत साफ है कि केंद्र सरकार के नहीं चाहने के बाद भी कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कानून सम्मत दखल किया गै। इसमें पहला मामला राफेल का था, जिसमें अदालत का फैसला सरकार के पक्ष में आ चुका है। यह अलग बात है कि फ्रांस में इसकी अलग से जांच चल रही है और वहां अब तक जो तथ्य निकलकर सामने आये हैं, वे भारत सरकार के दावों का समर्थन नहीं करते हैं।

इसके बाद केंद्र सरकार ने जासूसी स्पाईवेयर पेगासूस के बारे में भी संसद में नकारात्मक बयान दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी विशेषज्ञ कमेटी ने यह प्रारंभिक रिपोर्ट दी है कि पेगासूस स्पाईवेयर का प्रयोग भारत में किया गया है।

अब यह स्पाईवेयर भारत सरकार के किस मंत्रालय ने खरीदा है और उसका नियंत्रण किसके पास है, यह अब तक स्पष्ट नहीं है। लेकिन उसके बाद से लगातार सरकार और न्यायपालिका का टकराव बढ़ता ही जा रहा है। अब चुनाव आयोग के मुद्दे पर भी सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने गत सप्ताह सर्वसम्मति से उस विषय पर फैसला सुनाया जिसे महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।

लेकिन अदालत ने इसे दूर करने के लिए जो तरीका अपनाया वह बुनियादी समस्या को हल नहीं कर सकता और इसे केवल अंतरिम हल के रूप में ही देखा जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) तथा निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए और यह नियुक्ति उस समिति की अनुशंसा पर होनी चाहिए जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (अगर नेता प्रतिपक्ष न हो तो सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और कार्यपालिका के किसी भी प्रभाव से मुक्त होना चाहिए। केंद्र और राज्यों के स्तर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए यह आवश्यक है।

नागरिक समाज के विभिन्न हिस्सों में भी इस बात को लेकर चिंता रही है कि सीईसी और ईसी की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है।

आयोग में पूर्व में विश्वसनीय छवि वाले लोग नियुक्त हुए और उन्होंने अनेक सुधारों के साथ चुनावों को और अधिक विश्वसनीय बनाया, यह बात भी सही है कि हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों ने उसके आचरण पर चिंता जाहिर की है। संविधान के अनुच्छेद 324(2) में कहा गया है, निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा इतने ही निर्वाचन आयुक्त शामिल होने चाहिए।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा इस बारे में निर्मित कानूनों के अनुसार होनी चाहिए और उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल होनी चाहिए। चूंकि संसद ने इन तमाम वर्षों में कोई कानून नहीं बनाया इसलिए नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती रहीं।

बहरहाल, चूंकि यहां मामला निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता का है तो ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अनुशंसा करने के लिए समिति गठित किए जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। उदाहरण के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की नियुक्ति भी ऐसे ही एक पैनल द्वारा की जाती है लेकिन उस पर भी उसके आचरण के लिए निरंतर हमले होते रहते हैं।

ऐसे में उपयुक्त यही होगा कि संविधान सभा ने सीईसी और ईसी की नियुक्ति को लेकर जैसा सोचा था, उस प्रकार का एक व्यापक कानून लाया जाए और इसके साथ निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता को लेकर अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाए। इस संदर्भ में यह बात भी ध्यान देने लायक है कि कानून को केवल कार्यपालिका को अधिकारसंपन्न नहीं बनाना चाहिए।

यह भी अहम होगा कि बनने वाला कानून निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की स्थापना करते हुए उसे सभी संदेहों से परे करे। इस तरह साफ है कि केंद्रीय कानून मंत्री किरेण रिजिजू इस मोर्चे पर सरकार की तरफ से डटे हैं और हर बार न्यायपालिका पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने पहले भी सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की व्यवस्था को खत्म करने की बात कही थी।

अब चुनाव आयोग पर फैसला आने के बाद रिजिजू ने यह भी कहा है कि कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीश अब एंटी इंडिया मुहिम में शामिल हो गये हैं। यानी स्पष्ट है कि केंद्र सरकार को अब शीर्ष अदालत की न्यायिक सक्रियता से परेशानी हो रही है। इस दबाव से मुक्त होने के लिए ही विधि मंत्री लगातार आरोप लगा रहे हैं और अदालत को आगे बढ़ने से ठहर जाने का संकेत दे रहे हैं।

लेकिन देश की जनता को सरकार से अधिक पारदर्शिता की उम्मीद है। खास कर अडाणी प्रकरण में जिस तरीके से पर्देदारी की गयी है, वह जनता के मन में भ्रम पैदा करने वाला है। ऐसे में जनता क्या चाहती है, वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।