अराजकता और तानाशाही के बीच खड़ा भारतवर्ष
भारत आज एक बेहद अहम मोड़ पर खड़ा है। सड़कों पर गूंजते देश की रक्षा के नारे किसी स्वतंत्रता आंदोलन की याद दिलाते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर देश भर में चल रहा आंदोलन अपनी तरह का पहला अनूठा विरोध प्रदर्शन है। इन प्रदर्शनों को शुरू हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार अब तक हर कीमत पर मुख्य चुनाव आयुक्त का बचाव करने पर ही अड़ी हुई है।
किसी भी सच्चे लोकतंत्र के लिए यह स्थिति स्वीकार करना बेहद कठिन होगा, जहां विपक्षी दलों और कई नागरिक समाज संगठनों द्वारा अविश्वास जताए जाने के बावजूद सरकार सीईसी का बचाव कर रही हो। सत्ताधारी व्यवस्था का खुद को एक ऐसे संस्थान से जोड़ना, जिसे तटस्थ और निष्पक्ष होना चाहिए, हमारी पूरी चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सार्वजनिक डोमेन में मौजूद व्यावहारिक साक्ष्यों के साथ देखा जाए, तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल, विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिए मतदाता सूचियों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्सीमांकन (परिसीमन) को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। संविधान सभा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कार्यपालिका के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त एक निर्वाचन आयोग की वकालत की थी।
शिब्बन लाल सक्सेना और एच.एन. कुंजरू जैसे अन्य सदस्यों को भी आशंका थी कि यदि आयुक्तों को नियुक्त करने का अधिकार तत्कालीन सरकार के पास रहा, तो चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप होगा। कुंजरू ने चेतावनी दी थी कि ऐसी स्थिति में लोकतंत्र अपने स्रोत पर ही दूषित हो जाएगा। हालांकि, यह संदिग्ध है कि संविधान के अनुच्छेद 324 (पूर्व में प्रारूप अनुच्छेद 289) को तैयार करते समय इन चिंताओं पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था या नहीं।
इसमें केवल इतना कहा गया कि संसद चुनाव आयोग की स्थापना के लिए कानून बनाएगी और उसी के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति (यानी कार्यपालिका) आयोग की नियुक्ति करेंगे। मानवाधिकार आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और ऐसे अन्य आयोगों की तरह, वहां के चुनाव आयोग को संवैधानिक पाठ में ही एक स्वतंत्र निकाय के रूप में देखा गया है। कोस्टा रिका का सुप्रीम ट्रिब्यूनल ऑफ इलेक्शन भी एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण उदाहरण है जो चुनावी निकाय को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से स्वायत्तता प्रदान करता है।
भारतीय लोकतंत्र ने एक न्यायिक और राजनीतिक व्यवहार के माध्यम से राजनीतिक समानता के विचार को साकार किया, जो ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत पर आधारित है। सामाजिक और आर्थिक असमानता के बावजूद, जिसके बारे में अंबेडकर ने दुख व्यक्त किया था, भारत अपनी सीमाओं और कभी-कभार की कमियों के बावजूद दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए एक आदर्श बन गया।
लेकिन जनता का एक बड़ा वर्ग अब मानता है कि केंद्रीय स्तर पर सुनियोजित तरीके से मताधिकार छीनने और अन्य जोड़-तोड़ के तरीकों से भारत में चुनावों में धांधली की जा रही है। इसी भावना के कारण आंदोलन शुरू हुए हैं। हालांकि, सरकार आंदोलनों के पीछे की भावना को समझने से इनकार कर रही है और उन्हें बर्बरता से दबाने की कोशिश कर रही है। छात्रों और युवाओं का जन-आंदोलन अपने मुद्दे की मौलिकता के कारण पूरी तरह से तर्कसंगत है।
बांग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया, मेडागास्कर, मोरक्को, फ्रांस, स्पेन और ग्रीस में जेन जेड (Gen Z) आंदोलनों के विपरीत, भारत में सीईसी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आम तौर पर शांतिपूर्ण रहे हैं। युवाओं ने भयमुक्त होकर एकत्र होने और खुद को व्यक्त करने की अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग किया। ये मौलिक अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं, और सरकारों या पुलिस को उन्हें बलपूर्वक दबाने का कोई अधिकार नहीं है।
रामलीला मैदान मामले (2012) में सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि ऐसी स्थिति में राज्य की कार्रवाइयां न तो अन्यायपूर्ण होनी चाहिए और न ही अनुचित, अन्यथा यह अकारणता या मनमानेपन को बढ़ावा देगी, जिससे कानून, प्रक्रिया और उसके तहत की गई कार्रवाई दूषित होगी। पुलिस द्वारा न केवल छात्रों बल्कि संसद सदस्यों और नागरिक समाज के सदस्यों के साथ भी बदसलूकी की गई।
सैकड़ों नेताओं को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया। निवारक हिरासत कानूनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया। इंटरनेट बंद कर दिया गया। पुलिसिंग के मूल सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए महिला कार्यकर्ताओं को पुलिसकर्मियों द्वारा घसीटा गया। कई कार्यकर्ताओं को ले जाते समय पीटा गया। दिल्ली में तैनात कई पुलिसकर्मियों ने तो अपने नाम की पट्टियां (नेम प्लेट) भी नहीं पहन रखी थीं। जिस बेखौफ अंदाज में उन्होंने काम किया, वह चिंता का विषय है। छात्रों की प्रताड़ना और अवैध हिरासत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पुलिस ने सम्मान नहीं किया।