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अत्यधिक बल प्रयोग के दूसरे खतरे भी हैं

जंतर-मंतर या कनॉट प्लेस पर घंटों खड़े रहने वाले किसी आम पुलिसकर्मी को देखिए। वहीं पास खड़ा कोई किशोर, लाइक्स पाने के लिए उनके इस धैर्य को लाइव-स्ट्रीम करता है और मन ही मन सोचता है— कितना बेरहम, सरकारी पालतू कुत्ता।

लेकिन वह भी आप या मेरी तरह ही एक इंसान है। उसे भी बच्चों की स्कूल फीस भरनी है, बूढ़े माता-पिता की देखभाल करनी है, बिल चुकाने हैं, और घर पर नाराज पत्नी का सामना करना है जो पूछती है कि वह सब्जियां लेकर घर क्यों नहीं आया। एक महिला पुलिसकर्मी, जो गुस्से से भरी भीड़ का सामना कर रही है, उसे हमारे समाज में एक और लड़ाई लड़नी पड़ती है—जहाँ लोगों को यह बात खटकती है कि कोई महिला सत्ता या अधिकार के पदों पर है।

फिर भी, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे घंटों तक खड़ी रहें, गालियां सुनें, ताने और मज़ाक सहें, और नफरत भरे प्लेकार्ड देखें। जेन-ज़ी को शायद यह बात पसंद न आए, क्योंकि उनके लिए पुलिस वर्ग-शत्रु है—खासकर नक्सलवाद से प्रभावित छात्र आंदोलनों में। लेकिन ज़रा हकीकत के आईने में देखिए।

एक पल के लिए, पुलिसकर्मी को किसी बॉलीवुड एक्शन फिल्म का विलेन समझना छोड़ दीजिए। वे बस थके-हारे आम इंसान हैं, जो राजनीतिक आदेशों के एक कभी न खत्म होने वाले चक्र में फंसे हुए हैं। वे उन नेताओं के लिए एक ढाल का काम करते हैं, जिनके लिए जवाबदेही अब कोई मायने नहीं रखती।

एक वीडियो देखिए, जिसमें एक प्रदर्शनकारी और एक वकील, परेशान थानेदार से एक सीधा सा सवाल पूछते हैं:  किस कानून के तहत आपने इस प्रदर्शनकारी को हिरासत में लिया है? शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर आप बल प्रयोग क्यों कर रहे हैं?  जवाब में मिलता है—एक खामोश, बेबस नज़रा या फिर कोई बेतुका तर्क।

इस बीच, आदेश देने वाले नेता खाकी वर्दी के पीछे छिप जाते हैं, जबकि पुलिस—जिसे लोग अक्सर दिमागहीन कठपुतली समझते हैं—जनता की सारी नफरत झेलती है। सिस्टम अभी भी आधिकारिक लगता है, वर्दी अभी भी असली लगती है, और भाषा भी कानूनी लगती है। सत्ता को यह व्यवस्था बहुत पसंद है। जब समाज युवाओं को घसीटे जाते और पिटते देखकर गुस्से से उबल पड़ता है, तो सारी नफरत उन वर्दीधारी पुरुषों और महिलाओं पर बरसती है जो सत्ता का चेहरा हैं; जबकि आदेश देने वाले असली मालिक दूर ही रहते हैं।

यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि इस व्यवस्था के दुरुपयोग का एक सोचा-समझा हिस्सा है। आम तौर पर, अपनी जिम्मेदारी किसी कमज़ोर व्यक्ति पर डाल देना कायरता कहलाती है। लेकिन राजनीति में, इसे क्राइसिस मैनेजमेंट कहा जाता है। मंत्री कभी बैरिकेड्स के पीछे खड़े होकर, गुस्से से भरे युवाओं और कैमरों की फ्लैश का सामना नहीं करते।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अपने वातानुकूलित और सुरक्षित दफ्तरों से खाकी पहने पुलिसकर्मियों को ऐसे फैसले लागू करने का निर्देश देते हैं, जिन्हें लेने में उनकी कोई भूमिका नहीं होती। अगर ऑपरेशन सफल हो जाता है, तो सरकार व्यवस्था बहाल करने का श्रेय ले लेती है। लेकिन जब हालात बिगड़ जाते हैं, तो सारा दोष पुलिसकर्मी पर मढ़ दिया जाता है।

बेशक, कुछ पुलिसकर्मी गलत भी होते हैं: इनमें से ज्यादातर ग्रामीण और पितृसत्तात्मक पृष्ठभूमि से आते हैं, जहाँ संवेदना या सहानुभूति सिखाने का कोई चलन नहीं होता। कुछ भ्रष्ट अधिकारी होते हैं, जो हिरासत में लोगों को प्रताड़ित करते हैं, सबूत गढ़ते हैं या अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे ऐसा कर सकते हैं।

लेकिन यह मान लेना भी उतना ही गलत है कि खाकी पहनने वाला हर व्यक्ति अपराधी है। हमने ऐसा पहले भी देखा है। 1970 के दशक में अमेरिका में, जब वियतनाम युद्ध का विरोध कर रहे चार विश्वविद्यालय छात्रों को सैनिकों ने गोली मार दी थी, तो सरकार के इस रवैये के खिलाफ जनता का गुस्सा इतना भड़क गया कि प्रशासन को पीछे हटना पड़ा।

2011 के अरब स्प्रिंग में युवाओं का गुस्सा ही मुख्य ताकत था, जिसकी वजह से मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को सत्ता से हटना पड़ा। लाठी से सड़क तो खाली कराई जा सकती है, लेकिन पेपर लीक, बेरोजगारी या किसी ऐसी संस्था के प्रति खोए हुए भरोसे का जवाब नहीं दिया जा सकता, जिसका काम जवाबदेह होना है।

जब कोई सरकार नाराज नागरिकों को शांत करने में नाकाम रहती है और ताकत का सहारा लेती है, तो हो सकता है कि वह उस तात्कालिक टकराव में जीत जाए, लेकिन असल बहस में वह हार जाती है। इतने दिनों बाद भी चीन के तियानमेन चौक नरसंहार को दुनिया ने याद रखा है। नेपाल और बांग्लादेश के उदाहरण को देखें तो सत्ता के सुरक्षा बलों के पीछे छिपने का खतरनाक परिणाम भी हम देख चुके हैं। एक समय के बाद ये पुलिसवाले ही खुद ही गुलाम जैसा आचरण करना छोड़ देते हैं। उसके बाद क्या होगा, इसकी चिंता वर्तमान सरकार को होनी चाहिए।