पीएमएलए मामलों में बीच के रास्ते का सुझावः न्यायमूर्ति कौल
अपनी किताब में किया है इसका जिक्र
एक दूसरे जज भी वहां तब मौजूद थे
सरकार बार बार डेट बढ़ाती चली गयी
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय किशन कौल ने खुलासा किया है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने उनसे धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों की समीक्षा वाली याचिकाओं में बीच का रास्ता अपनाने का अनुरोध किया था।
इसके अलावा, एक अन्य खुलासे में जस्टिस कौल ने कहा कि जब वह कॉलेजियम की लंबित सिफारिशों पर केंद्र सरकार से कार्रवाई की मांग कर रहे थे, तब जजों की नियुक्ति में देरी से जुड़ा मामला उनकी पीठ से वापस ले लिया गया था। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि तत्कालीन सीजेआई पर उस मामले को उनकी पीठ से हटाने का दबाव था।
अपनी आगामी पुस्तक विदाउट फियर ऑर फेवर का जिक्र करते हुए जस्टिस कौल ने इन घटनाओं को साझा किया। पीएमएलए मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जब वह विजय मदनलाल चौधरी फैसले की समीक्षा याचिका पर सुनवाई करने वाले थे, तब सीजेआई ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया था। चर्चा के दौरान पीठ के सदस्य जस्टिस संजीव खन्ना भी मौजूद थे।
जस्टिस कौल के अनुसार, सीजेआई चंद्रचूड़ ने उन्हें मामले को आगे न बढ़ाने या सावधानी बरतते हुए बीच का रास्ता अपनाने का सुझाव दिया। हालांकि, जस्टिस कौल ने सुनवाई जारी रखने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि अपने 22 साल के न्यायिक करियर में उन्होंने कभी बीच का रास्ता नहीं चुना और यदि वह इस मोड़ पर पीछे हटते तो उनकी निष्ठा और ईमानदारी पर सवाल उठते।
जस्टिस कौल ने आगे बताया कि केंद्र सरकार उनके सेवानिवृत्त होने तक इस मामले को टालना चाहती थी और बार-बार स्थगन मांग रही थी। आखिरकार, उनके रिटायरमेंट से कुछ समय पहले पीठ को भंग कर दिया गया।
उन्होंने यह भी खुलासा किया कि इस सुनवाई से पहले मामले को उनकी पीठ से हटाने का प्रयास किया गया था, जिसको लेकर उन्होंने सीजेआई से आपत्ति भी जताई थी। बाद में सीजेआई ने जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी के साथ तीन जजों की पीठ का गठन किया था।