अपराधियों में खौफ पैदा करने वाले जज से निजात मिली
सजा ए मौत देने का नया रिकार्ड है
अनेक मामले उनसे वापस लिये गये
अब फैमिली कोर्ट में जिम्मेदारी मिली
राष्ट्रीय खबर
लखनऊः चालू वर्ष में अप्रैल से सितंबर के बीच मुजफ्फरनगर में 11 मामलों में 23 मृत्युदंड और बरेली में 13 मामलों में फांसी की सजा सुनाकर राष्ट्रीय सुर्खियों में आए न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर का तबादला कर दिया गया है। एक न्यायिक स्थानांतरण आदेश के अनुसार, उन्हें फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से फ़ैमिली कोर्ट (परिवार न्यायालय) में स्थानांतरित किया गया है। अब वे मुजफ्फरनगर के परिवार न्यायालय के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभालेंगे।
17 अगस्त को जज दिवाकर द्वारा लगातार दी गई मृत्युदंड की सजाओं की जानकारी सार्वजनिक हुई थी। उन्हें 29 नवंबर 2025 को मुजफ्फरनगर स्थानांतरित किया गया था। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट-3 के पीठासीन अधिकारी के रूप में, उन्होंने मुजफ्फरनगर और शामली जिलों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई की। 7 सितंबर को उन्होंने अपनी पत्नी को जिंदा जलाने वाले एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए मुजफ्फरनगर अदालत में 23वां मृत्युदंड सुनाया था।
उनका कार्यकाल तब विवादों में आया जब अगस्त में तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश बीरेंद्र कुमार सिंह के आदेश पर हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़ी कम से कम 97 लंबित मामलों की फाइलें उनकी अदालत से वापस मंगा ली गईं। बीरेंद्र कुमार सिंह अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
दिवाकर ने बाद में इन फाइलों को वापस लेने के आधार पर सवाल उठाए। एनडीपीएस के एक मामले में फैसला सुनाते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि मुद्दा केवल यह नहीं है कि प्रशासनिक आधार पर ऐसी फाइलें वापस ली जा सकती हैं या नहीं, बल्कि इस शक्ति का उपयोग करने के पीछे के कारणों और दर्ज किए गए कारणों की अनुपस्थिति पर भी विचार जरूरी है।
इससे पहले मई 2022 में, वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के रूप में, दिवाकर ने श्रृंगार गौरी स्थल पर पांच हिंदू महिलाओं के पूजा अधिकारों से संबंधित एक मामले में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के अदालत-निरीक्षित वीडियोग्राफी सर्वेक्षण का आदेश दिया था। इस सर्वे के दौरान वुज़ू खाना क्षेत्र में मिली एक संरचना को हिंदू पक्ष ने शिवलिंग बताया था, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसे खारिज किया। बाद में उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने इस मामले को वाराणसी के जिला न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित कर दिया था।
इस आदेश के बाद जज दिवाकर ने धमकियां मिलने की बात कही थी, जिसके बाद अधिकारियों ने उनकी सुरक्षा की समीक्षा की थी। वर्ष 2024 में उन्होंने फिर से अंतरराष्ट्रीय फोन नंबरों से सुरक्षा खतरों की चिंता जताई थी।
हाल ही में, मुजफ्फरनगर में अपनी नियुक्ति के दौरान, उन्होंने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में किए गए बदलावों पर सवाल उठाए थे। उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को भेजे पत्र में उन्होंने कहा था कि उनके आवंटित गनर को हटाए जाने से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। हालांकि, पुलिस का कहना था कि गनर के स्थान पर अन्य सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे।
46 वर्षीय दिवाकर 2009 में मुंसिफ/सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में शामिल हुए थे। उनके पास बी.कॉम, एलएलबी और एलएलएम की डिग्रियां हैं। उनकी पिछली नियुक्तियों में आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं और वाराणसी शामिल हैं। उन्होंने अप्रैल 2021 से जुलाई 2022 तक वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के रूप में कार्य किया। इसके बाद वे बरेली चले गए, जहां वे बाद में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट) बने। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वे अप्रैल से नवंबर 2025 तक चित्रकूट में तैनात थे और नवंबर 2025 में मुजफ्फरनगर आए थे।
नवीनतम न्यायिक आदेश के अनुसार, फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट-2 की पीठासीन अधिकारी और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शिव कुमारी को अब फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट-3 में स्थानांतरित कर दिया गया है।