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खाकी की मनमानी पर न्यायपालिका का कड़ा पहरा

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का शासन ही वह आधारशिला है, जिस पर नागरिकों के अधिकार टिके हुए हैं। समय-समय पर देश की सर्वोच्च अदालत ने यह साबित किया है कि संविधान की मूल भावना नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, न कि राज्य तंत्र को असीमित अधिकार देना। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया एक नया फैसला इसी दिशा में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।

इस ऐतिहासिक निर्णय के तहत अदालत ने पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की मनमानी पर न केवल कड़ी रोक लगा दी है, बल्कि यह भी अनिवार्य कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी केवल औपचारिकता या संदेह के आधार पर नहीं की जा सकती। वरना हाल के दिनों में सामान्य नागरिकों के अलावा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ भी पुलिस ने अनेक किस्म के अनैतिक फैसले लिये हैं।

उदाहरण के तौर पर दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद का उदाहरण सबसे प्रमुख है, जिसे इतने दिनों तक जेल में बंद रखा गया है जबकि मामले की जांच की गाड़ी आज तक आगे नहीं बढ़ पायी है। अब अदालत का स्पष्ट निर्देश है कि गिरफ्तार किए गए प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपनी समझ में आने वाली भाषा में यह लिखित रूप में बताना होगा कि उसकी गिरफ्तारी का ठोस आधार क्या है और उसे क्यों हिरासत में लिया जा रहा है।

यह आदेश महज एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में पारदर्शित और मानवाधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। अक्सर यह देखा गया है कि गिरफ्तारी के समय आरोपियों को कानूनी पेचीदगियों या अंग्रेजी जैसी भाषाओं का हवाला देकर अंधेरे में रखा जाता है, जिससे वे अपनी शुरुआती कानूनी लड़ाई ठीक से नहीं लड़ पाते।

इस फैसले का सबसे बड़ा और दूरगामी पहलू यह है कि इसके दायरे में वे केंद्रीय जांच एजेंसियां भी पूरी तरह आ गई हैं, जिन पर अक्सर सत्ताधारी दलों द्वारा राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। विपक्षी आवाजों को दबाने, असंतोष को कुचलने और राजनीतिक विरोधियों को बिना पुख्ता कारणों के महीनों जेल में सड़ाने की प्रवृत्ति पर इस फैसले ने बड़ा प्रहार किया है।

अब चाहे वह सीबीआई हो, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) या अन्य कोई भी जांच इकाई, हर किसी को अदालत के इन कड़े दिशा-निर्देशों का पालन करना ही होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि यह नियम पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) और यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) जैसे बेहद कठोर और विशेष कानूनों पर भी समान रूप से लागू होगा। इन कानूनों की बनावट ऐसी रही है कि इनमें जमानत मिलना बेहद कठिन होता है और अक्सर प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।

ऐसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तारी के आधार को पारदर्शी बनाना और आरोपी को उसकी स्थानीय भाषा में इसकी जानकारी देना नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए जीवनरेखा का काम करेगा। जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को छीना जाता है, तो राज्य का यह दायित्व बन जाता है कि वह पारदर्शिता बरते। तानाशाही प्रवृत्तियों और पुलिसिया दमन को रोकने के लिए न्यायपालिका का यह हस्तक्षेप बेहद जरूरी था।

यह निर्णय इस बात की याद दिलाता है कि एक जीवंत लोकतंत्र में राज्य और नागरिक के बीच शक्ति का संतुलन हमेशा नागरिक के पक्ष में थोड़ा झुका होना चाहिए, ताकि सत्ता के दुरुपयोग की गुंजाइश कम से कम हो सके। निसंदेह, यह फैसला कानून के जानकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है।

हालांकि, असली चुनौती इस आदेश के जमीनी क्रियान्वयन में है। अदालतों के कागजी निर्देश तब तक सार्थक नहीं होते जब तक कि जमीनी स्तर पर पुलिसकर्मी और जांच एजेंसियां पूरी ईमानदारी से इसका पालन न करें। यदि इस फैसले का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाता है, तो यह भारतीय न्याय प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत करेगा, जहां मनमानी गिरफ्तारियों और राजनीतिक उत्पीड़न पर प्रभावी लगाम लगेगी।

वरना इस देश ने दो दो मुख्यमंत्रियों की राजनीतिक कारणों से हुई गिरफ्तारी का मामला देखा है। जिसमें पुलिस अथवा सरकारी एजेंसियों ने सिर्फ केंद्र सरकार के इशारे पर काम किया है। अब कानूनी अंकुश लगा होने की वजह से पुलिस के लोग किसी को भी यह कहकर नहीं ले जा सकते कि चलो तुम्हें गिरफ्तार किया गया है। अदालत के फैसले से सिर्फ पुलिस की मनमानी ही नहीं बल्कि पुलिस का गलत तरीके से राजनीतिक इस्तेमाल करने वालों पर भी एक स्पीड ब्रेकर लग जाएगा। वरना हाल के दिनों में इसका अत्यधिक दुरुपयोग हुआ है।