न्यायिक बहुसंख्यकवाद पर पहली बार आवाज उठायी गयी
अब तो प्रक्रिया ही सजा के तौर पर है
अपने लेख में खुलेआम आलोचना कर दी
भीमा कोरेगांव मामले का भी उल्लेख किया
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने में न्यायपालिका की विफलता की तीखी आलोचना की है। एक अंग्रेजी दैनिक में अपने लेख में उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ता उमर खालिद की लंबी कैद और भीमा-कोरेगांव (एल्गार परिषद) मामले का विशेष रूप से हवाला देते हुए कहा कि प्रक्रिया ही सजा बन गई है, क्योंकि लोगों को राष्ट्रविरोधी करार देकर उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी जाती है और अदालतें उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि आरोप उतने ही गंभीर थे जैसा कि दावा किया गया था, तो अभियोजन पक्ष ने मुकदमा शुरू करने में वैसी तत्परता क्यों नहीं दिखाई? उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि नागरिक बिना किसी डर के सोच और बोल सकें, असहमति व्यक्त कर सकें और जाति या धर्म के भेदभाव के बिना समान व्यवहार प्राप्त कर सकें। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी देश तब तक स्वतंत्र होने का दावा नहीं कर सकता जब तक उसके पास एक स्वतंत्र और निर्भीक न्यायपालिका न हो, जिसके लिए ऐसे न्यायाधीशों की आवश्यकता होती है जिनमें ईमानदारी, बुद्धि और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की ताकत हो।
जस्टिस गुप्ता ने लिखा है कि हाल के वर्षों में संवैधानिक अदालतों ने अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने में अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई है और कई मामलों में अदालतें मूकदर्शक बन गई हैं। उन्होंने जेल नहीं, जमानत के सिद्धांत के उलट यह चिंता जताई कि व्यवहार में जमानत नहीं, जेल का नियम बन गया है, और यह बेहद चौंकाने वाला है कि जेल में बंद कुल कैदियों में लगभग 75 प्रतिशत लोग विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल) हैं, जबकि दोषी ठहराए गए कैदी केवल 24 प्रतिशत के करीब हैं।
उमर खालिद के मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि वह छह साल से अधिक समय से जेल में हैं और अभी तक मुकदमा भी शुरू नहीं हुआ है, ऐसे में उनके स्वतंत्रता और त्वरित न्याय के अधिकारों का क्या हुआ? उन्होंने एल्गार परिषद मामले का भी उल्लेख किया, जिसके आरोपी वर्षों से जेल में हैं और एक की जेल में मौत भी हो चुकी है, जबकि घटना के आठ साल बाद भी ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सोनम वांगचुक की हिरासत और सुप्रीम कोर्ट द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण मामलों में बार-बार सुनवाई टालने की भी आलोचना की।
न्यायपालिका के भीतर बहुसंख्यकवाद पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र भले ही बहुमत के नियम पर चलता हो, लेकिन बहुसंख्यकवाद—जहां दूसरे पक्ष की आवाज न सुनी जाए—लोकतंत्र के लिए अभिशाप है। उन्होंने इस संदर्भ में राम जन्मभूमि और ज्ञानवापी मामलों का हवाला दिया और जमानत के मामलों में अलग-अलग समुदायों के साथ अलग-अलग व्यवहार किए जाने की बात भी उठाई। कॉलेजियम प्रणाली को पूरी तरह से पारदर्शी बताते हुए उन्होंने न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और उच्च न्यायपालिका की संरचना पर भी सवाल उठाए। अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लोगों का न्यायपालिका से भरोसा उठ गया, तो यह एक लोकतांत्रिक भारत के लिए खतरे की घंटी साबित होगा।