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तेजी से पिघलते ग्लेशियरों ने बढ़ा दिया है विनाश का खतरा, देखें वीडियो

देवभूमि उत्तराखंड के ग्लेशियरों का संकट बढ़ा

हिमालय के पहाड़ों का हाल बदल रहा

अनेक स्थानों पर नये जलाशय बन गये

जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है

राष्ट्रीय खबर

देहरादूनः उत्तराखंड के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर एक बेहद चिंताजनक वैज्ञानिक खुलासा सामने आया है। भारतीय मध्य हिमालय क्षेत्र में स्थित प्रमुख ग्लेशियर अत्यधिक तेजी से पीछे खिसक रहे हैं, जिससे वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।

दून विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले यूपीईएस, देहरादून और प्रतिष्ठित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के शोधकर्ताओं ने मिलकर इस पर एक विस्तृत समीक्षा की है, जिसे हाल ही में डिस्कवर जियोसाइंस नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इस वैज्ञानिक अध्ययन में वर्ष 1990 से 2024 के बीच उपलब्ध विभिन्न शोध पत्रों, मैदानी सर्वेक्षणों, सैटेलाइट तस्वीरों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल का बारीकी से विश्लेषण किया गया है।

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इस व्यापक समीक्षा में उत्तराखंड के 23 बड़े ग्लेशियरों में कुल मिलाकर 25,621 मीटर से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। अध्ययन के अनुसार, ग्लेशियरों के पीछे हटने की औसत दर लगभग 23 से 24 मीटर प्रति वर्ष आंकी गई है, जो जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को दर्शाती है।

टिहरी गढ़वाल का प्रसिद्ध खातलिंग ग्लेशियर सबसे तेजी से पिघलने वाले क्षेत्रों में है, जहां 1965 से 2014 के दौरान यह करीब 4.34 किलोमीटर पीछे हट चुका है और छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गया है। इसके अलावा, पिंडारी ग्लेशियर में 45.8 मीटर प्रति वर्ष और मिलाम ग्लेशियर में 37.8 मीटर प्रति वर्ष की दर से बर्फ पीछे खिसकी है। गंगोत्री, चोराबाड़ी और सतोपंथ जैसे अन्य प्रमुख ग्लेशियरों में भी लगातार सिकुड़न दर्ज की गई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लेशियरों के इस तरह पीछे हटने की प्रक्रिया केवल बढ़ते तापमान पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि इसके पीछे कई अन्य भौगोलिक कारक भी काम करते हैं। बर्फ की सतह पर जमा होने वाला चट्टानी मलबा कई बार एक सुरक्षा कवच (इन्सुलेशन) की तरह काम करता है, जिससे सतही पिघलाव की रफ्तार कुछ हद तक धीमी हो जाती है। यही कारण है कि मलबे से ढके ग्लेशियर, साफ बर्फ वाले ग्लेशियरों की तुलना में कम तेजी से पीछे हटते हैं।

इसके अतिरिक्त, ग्लेशियर की ऊंचाई, ढलान, उसका आकार और दिशा भी इसके अस्तित्व को तय करते हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन ग्लेशियरों के सामने झीलों का निर्माण हो गया है। वे सामान्य जमीन पर समाप्त होने वाले ग्लेशियरों की तुलना में अधिक तेजी से (लगभग 34.9 मीटर प्रति वर्ष) पीछे हट रहे हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुसार, अलकनंदा बेसिन क्षेत्र में बर्फ की रेखा (स्नोलाइन) ऊंची हुई है और छोटे आकार के ग्लेशियरों का क्षेत्रफल तेजी से घट रहा है, जो भविष्य के लिए एक बड़ी चेतावनी है।