पड़ताल
अधिकारियों को जल्दी जल्दी क्यों बदला जा रहा
वरीयता क्रम की अनदेखी और नियमों की धज्जियां
पदों की खरीद-फरोख्त और कुर्सी की रेस
बिचौलियों का नेटवर्क और मेरठ कनेक्शन
राष्ट्रीय खबर
रांचीः झारखंड के उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक व्यवस्था तेजी से चरमरा रही है। शुरुआत में इस तरह की गड़बड़ियों और शिकायतों का केंद्र सिर्फ रांची विश्वविद्यालय हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यह संकट राज्य के लगभग हर विश्वविद्यालय में नासूर बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि इसके पीछे की वजहें अब किसी से छिपी नहीं हैं और आम जनता तक इन गड़बड़ियों के असली कारणों से पर्दा उठ चुका है। हालांकि, स्थिति यह है कि राज्य सरकार या तो इस पूरे खेल से अनजान बनी हुई है या फिर सब कुछ जानते हुए भी इस पर पूरी तरह चुप्पी साधे बैठी है।
मामले की गहराई से छानबीन करने पर जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। शुरुआती दौर में यह पूरा खेल केवल वाइस चांसलर यानी कुलपतियों के तबादलों और नियुक्तियों तक सीमित था। लेकिन धीरे-धीरे जब इस अवैध व्यापार के खरीदार और बिचौलिए बढ़ते गए, तो विश्वविद्यालयों के अन्य महत्वपूर्ण पदों की भी खुलेआम दुकानदारी शुरू हो गई।
वर्तमान स्थिति यह है कि विश्वविद्यालयों के तमाम अहम पदों को लेकर एक अंतहीन ‘कुर्सी दौड़’ चल रही है। हालात इतने अनिश्चित हैं कि कौन अधिकारी किस पद पर कब तक टिकेगा और कब उसे अचानक हटा दिया जाएगा, इसका अंदाजा खुद उस पद पर बैठे अधिकारी तक को नहीं होता।
पड़ताल के दौरान यह भी खुलासा हुआ है कि कई विश्वविद्यालयों के विभिन्न विभागों में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां करते वक्त नियमों और वरीयता क्रम (सिनियरिटी लिस्ट) की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को बड़े पदों पर बैठाया जा रहा है, जिसके कई स्पष्ट और अकाट्य उदाहरण आज सबके सामने मौजूद हैं। अधिकारियों और प्रोफेसरों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि योग्यता और अनुभव दरकिनार कर केवल सौदेबाजी के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं।
आखिरकार इतनी तेजी से अधिकारियों के बदले जाने और नियुक्तियों में फेरबदल होने की असल वजह क्या है? जांच में यह बात सामने आई है कि नियुक्तियों के नाम पर वसूली जाने वाली पूरी रकम तय जगह यानी ऊपर तक नहीं पहुंच पाती है। बिचौलिए और दलाल बीच में ही एक बड़ा हिस्सा हड़प लेते हैं। जब तयशुदा रकम ऊपर तक नहीं पहुंचती, तो पद के दूसरे दावेदार इस बात की शिकायत लेकर पहुंच जाते हैं, जिसके बाद रातों-रात अधिकारी को बदल दिया जाता है।
इन बिचौलियों की पहचान अब किसी से छिपी नहीं है और यह जगजाहिर हो चुका है। खास तौर पर इन दिनों इस तरह की पैरवियों और सौदों का संचालन एक नए रूट यानी ‘मेरठ’ के जरिए होने लगा है, जिसकी जानकारी शिक्षा जगत से जुड़े लगभग हर व्यक्ति को है। बहरहाल, विश्वविद्यालयों जैसी पवित्र संस्थाओं में इस तरह के खेल से राज्य का शैक्षणिक भविष्य गहरे संकट में पड़ता नजर आ रहा है।