झारखंड जैसे खनिज बहुल राज्यों को होगा राजस्व नुकसान
नया खंड 9 डी जोड़ा गया है इसमें
केंद्र अपनी पकड़ मजबूत करेगी इससे
राज्यों की रॉयल्टी कोई कर नहीं है
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः केंद्र सरकार ने सोमवार को लोकसभा में खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को पेश किया है। इस महत्वपूर्ण और दूरगामी विधेयक का मुख्य उद्देश्य राज्यों को खनन और खनिजों पर किसी भी तरह के कर या अन्य स्थानीय लेवी (शुल्क) लगाने से रोकना है। इस विधायी कदम के जरिए केंद्र सरकार का लक्ष्य न केवल खनन क्षेत्र में नीतिगत एकरूपता लाना है, बल्कि खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 में निहित प्रावधानों के अंतर्गत खनिज-युक्त भूमि के विनियमन पर अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करना भी है।
इस नए संशोधन विधेयक के तहत अधिनियम में एक नया खंड 9डी जोड़ा गया है। इसके प्रावधानों के अनुसार, अब कोई भी राज्य सरकार खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी प्रकार का कर, उपकर (सेस), या अन्य कोई भी शुल्क नहीं लगा सकेगी। यह प्रतिबंध खनिज की मात्रा, खनिज के मूल्य, रॉयल्टी या किसी भी अन्य आधार पर लगाए जाने वाले शुल्कों पर पूरी तरह लागू होगा।
हालांकि, इसमें यह अपवाद भी रखा गया है कि यदि केंद्र सरकार द्वारा कोई विशेष शर्तें या प्रतिबंध निर्धारित किए जाते हैं, तो उनके दायरे में ही राज्य कुछ सीमित कदम उठा सकते हैं। केंद्रीय कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने विपक्षी सदस्यों के कड़े विरोध और हंगामे के बीच इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया।
यह विधायी प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के दो साल से अधिक समय बाद आया है। उस अदालती फैसले में न्यायालय ने खानों और खनिज-युक्त जमीनों पर स्वतंत्र रूप से कर लगाने के राज्यों के अधिकारों को बरकरार रखा था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि खनिजों पर केंद्र सरकार को चुकाई जाने वाली रॉयल्टी किसी प्रकार का कर नहीं है। इस कानूनी स्थिति के बाद राज्यों और केंद्र के बीच कर अधिकारों को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई थी, जिसे दूर करने के लिए अब यह नया संशोधन लाया गया है।
सरकार का पक्ष है कि इस संशोधन विधेयक का प्राथमिक उद्देश्य खनन क्षेत्र से जुड़े कार्यों पर वित्तीय बोझ को कम करना है, ताकि देश में खनन गतिविधियों को निवेशकों के लिए अधिक व्यावसायिक रूप से आकर्षक और सुगम बनाया जा सके।
मौजूदा विनियामक ढांचे के तहत, केंद्र सरकार का नियंत्रण मुख्य रूप से खानों और खनिज विकास तक ही सीमित रहा है, जिसमें अन्वेषण (एक्सप्लोरेशन), निष्खनन (एक्सट्रैक्शन), लाइसेंसिंग और खनन संचालन जैसी तकनीकी गतिविधियां शामिल हैं। लेकिन, खनिजों को समाहित करने वाली भूमि सीधे तौर पर केंद्र के नियामक दायरे में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं थी।
इस विसंगति के कारण खनन गतिविधि और उसके नीचे की भूमि के बीच एक जटिल कानूनी अंतर पैदा हो गया था। इस अस्पष्टता के चलते विभिन्न राज्यों के पास खनिज-युक्त भूमि से जुड़े करों और शुल्कों की अपने-अपने तरीके से व्याख्या करने और राजस्व वसूलने की गुंजाइश बच जाती थी।
नया विधेयक इसी कानूनी अस्पष्टता को समाप्त करने का प्रयास करता है। यह विधेयक खनिज-युक्त भूमि को उन स्पष्ट मापदंडों के आधार पर परिभाषित करता है, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाएगा। इसके लागू होने से देश भर के खनन क्षेत्र में विनियामक स्पष्टता आएगी और केंद्र-राज्य वित्तीय अधिकारों का दायरा अधिक निश्चित हो सकेगा।