जनता का धैर्य और संवाद का संकट
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता और उसका भावी भविष्य—यानी युवा—होते हैं। लेकिन जब यही युवा अपनी न्यायसंगत मांगों, निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और सुरक्षित भविष्य के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाएं और सरकार उनके प्रति असंवेदनशील बनी रहे, तो यह स्थिति किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बन जाती है।
बीते दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर संसद के मुहाने तक जो अभूतपूर्व घटनाक्रम देखने को मिला, वह केवल एक छात्र आंदोलन मात्र नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों नौजवानों के भीतर सुलग रहे असंतोष और आक्रोश का एक ऐसा विस्फोट है, जिसे अब केवल लाठियों और आंसू गैस के गोलों से दबाया नहीं जा सकता।
मई महीने में नीट परीक्षा पेपर लीक और निरंतर हो रही घपलेबाजी के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुआ, तो सरकार ने शायद इसे एक मामूली सांकेतिक विरोध समझने की भूल कर दी। 20 जुलाई को जब युवाओं ने संसद चलो का आह्वान किया, तो सुरक्षा एजेंसियों के तमाम दावे ध्वस्त हो गए।
नई दिल्ली जिले में इंटरनेट सेवाएं बंद करने, त्रिस्तरीय बैरिकेडिंग लगाने और हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के बावजूद दसों हजार छात्र संसद के मुख्य प्रवेश द्वार से महज 100 मीटर की दूरी तक जा पहुंचे। इसके बाद दिल्ली पुलिस द्वारा किया गया लाठीचार्ज, पानी की बौछारें और आंसू गैस का प्रयोग लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाता है।
अपने ही देश के छात्रों पर, जो केवल भ्रष्टाचार मुक्त शिक्षा प्रणाली और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, इस प्रकार का बलप्रयोग सर्वथा निंदनीय और अनुचित है। इस पूरे घटनाक्रम में प्रख्यात पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन आंदोलन की रीढ़ बनकर उभरा है।
20 दिनों से अधिक समय से भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक को जब पुलिस ने जबरन उठाकर अस्पताल पहुंचाया, तो इससे जन-आक्रोश शांत होने के बजाय और तीव्र हो गया। वांगचुक का अस्पताल के बिस्तर से भी अपनी भूख हड़ताल जारी रखने का संकल्प यह स्पष्ट दर्शाता है कि यह संघर्ष किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि देश की व्यवस्था को सुधारने की एक नैतिक पुकार है।
जब एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित व्यक्तित्व को अपने ही देश के युवाओं के अधिकारों के लिए अन्न-जल त्यागना पड़े, तो यह सरकार की संवादहीनता की पराकाष्ठा को उजागर करता है। संसद के मुहाने तक पहुंचे अभूतपूर्व जनसैलाब और गृह मंत्री अमित शाह व शिक्षा मंत्री के बीच चली घंटों की बैठकों के बाद, केंद्र सरकार की नींद खुली।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने सीजेपी के प्रतिनिधियों—सौरव दास और आशुतोष रंका—से मुलाकात की। हालांकि, इस मुलाकात में उचित स्तर पर चर्चा करने का गोलमोल आश्वासन तो दिया गया, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे या पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून बनाने को लेकर कोई स्पष्ट या समयबद्ध प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं की गई।
प्रतिनिधियों को केवल जुबानी आश्वासनों से बहलाने की यह कोशिश दर्शाती है कि शासन प्रणाली अभी भी संकट की गहराई को स्वीकार करने से बच रही है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस किसी सत्ता ने देश की युवा शक्ति की आवाज को अनसुना किया है, उसे उसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े हैं। 152 से अधिक पेपर लीक और 7.5 करोड़ से अधिक छात्रों का प्रभावित होना कोई छोटी-मोटी प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह पूरी शिक्षा और रोजगार प्रणाली के ध्वस्त होने का प्रमाण है।
सत्ता में बैठे शीर्ष नेतृत्व को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि सरकार को अपनी ही जनता के धैर्य को इतना अधिक नहीं आजमाना चाहिए। अहंकार और हठधर्मिता से जन-आंदोलन समाप्त नहीं होते, बल्कि वे और अधिक उग्र रूप धारण कर लेते हैं। छात्रों को सड़कों पर दौड़ा-दौड़कर पीटना, उन पर लाठियां भांजना और उनकी आवाज दबाने के लिए इंटरनेट बंद कर देना कोई स्थायी समाधान नहीं है।
यदि सरकार वास्तव में लोकतंत्र का सम्मान करती है, तो उसे तत्काल प्रभाव से प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता बहाल करने के लिए कठोर और पारदर्शी कदम उठाने चाहिए। छात्रों की मुख्य मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए प्रशासनिक जवाबदेही तय करनी चाहिए। दमनकारी नीतियां छोड़कर आंदोलित युवाओं और सोनम वांगचुक जैसे विचारकों से सीधे और सच्चे मन से संवाद कायम करना चाहिए।
याद रहे, सत्ता चिरस्थायी नहीं होती, लेकिन जनता के साथ किया गया व्यवहार और उसके अधिकारों का हनन इतिहास के पन्नों में हमेशा दर्ज रहता है। जनता का धैर्य जब टूटता है, तो बड़े-बड़े सिंहासन डगमगा जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और बाद में अन्ना के आंदोलन को भी इसी तरीके से दबाने की साजिश हुई थी। उसका नतीजा क्या निकला, यह देश के सामने उदाहरण के तौर पर मौजूद है।