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संवेदनशीलता की अनदेखी और लापरवाही की भारी कीमत, देखें वीडियो

केरल का वायनाड जिला अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ अपनी अत्यधिक संवेदनशील भौगोलिक बनावट के लिए भी जाना जाता है। पश्चिमी घाट का हिस्सा होने के कारण यह क्षेत्र पर्यावरण के दृष्टिकोण से बेहद नाजुक है। हाल ही में वायनाड में एक निर्माणाधीन हाईवे सुरंग के पास हुए एक भीषण हादसे ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन के गंभीर सवाल को एक बार फिर सतह पर ला दिया है।

इस भूस्खलन में तीन लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और कई अन्य लोग लापता बताए जा रहे हैं। यह हादसा महज़ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह विकास के नाम पर की जा रही अंधाधुंध अनदेखी और प्रशासनिक चेतावनियों को ठेंगा दिखाने का एक जीता-जागता उदाहरण बन गया है। वायनाड का यह विशिष्ट क्षेत्र अपनी नर्म मिट्टी और ढलानों के लिए जाना जाता है।

देखें घटना का वीडियो विस्तार से

पर्यावरण विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों ने इस सुरंग परियोजना की शुरुआत से पहले ही स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी। विशेषज्ञों का मानना था कि भारी मशीनों का उपयोग, पहाड़ों की कटाई और सुरंग के लिए किए जाने वाले विस्फोट इस क्षेत्र की आंतरिक संरचना को हिलाकर रख देंगे। इस क्षेत्र की मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता तो अधिक है, लेकिन जब यह क्षमता अपनी सीमा पार कर जाती है, तो मिट्टी पूरी तरह से ढीली होकर बहने लगती है।

पश्चिमी घाट के इस हिस्से में किसी भी तरह का बड़ा निर्माण कार्य शुरू करने से पहले कड़े सुरक्षा मानकों और पर्यावरण प्रभाव आकलन की गहन समीक्षा की आवश्यकता थी, जिसे सतही तौर पर लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला और परेशान करने वाला तथ्य यह सामने आया है कि खुद जिला कलेक्टर ने समय रहते संभावित खतरे को भांप लिया था।

जांच रिपोर्टों और प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, जिला कलेक्टर ने कार्यस्थल का निरीक्षण करने के बाद निर्माण कार्य में लगी कंपनियों को स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए थे। निर्देश में कहा गया था कि सुरंग की खुदाई के दौरान निकलने वाली भारी मात्रा में फालतू मिट्टी और मलबे को तत्काल प्रभाव से उस संवेदनशील ढलान वाले कार्यस्थल से हटाया जाए। वैज्ञानिक नियम कहते हैं कि ढलानों पर जमा अनियंत्रित मलबा नीचे की मिट्टी पर अतिरिक्त दबाव बनाता है।

यदि बारिश हो जाए या नीचे की जमीन थोड़ी भी खिसके, तो यह मलबा एक बड़े मलबे के पहाड़ की तरह नीचे गिरता है। जिला कलेक्टर के इस बेहद महत्वपूर्ण सुरक्षा निर्देश के बावजूद, काम करने वाली निर्माण कंपनियों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। कंपनियों ने लागत बचाने या लापरवाही के चलते उस फालतू मिट्टी को वहीं जमा रहने दिया, जो अंततः इस भीषण तबाही का मुख्य कारण बनी। घटना के दिन, भारी दबाव और मिट्टी के ढीले होने के कारण अचानक एक विशाल भूस्खलन हुआ।

टनों वजनी मिट्टी और मलबे का हिस्सा सीधे निर्माण स्थल और वहां काम कर रहे श्रमिकों पर आ गिरा। इस अचानक आए मलबे ने वहां मौजूद लोगों को संभलने तक का मौका नहीं दिया। अब तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, तीन श्रमिकों के शव मलबे से निकाले जा चुके हैं, जबकि अनेक लोग अब भी लापता हैं।

लापता लोगों को तलाशने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल और स्थानीय बचाव दल लगातार काम कर रहे हैं, लेकिन लगातार खिसकती मिट्टी और दुर्गम इलाका बचाव कार्य में बड़ी बाधा बना हुआ है। यह हादसा एक बार फिर इस कड़वे सच को उजागर करता है कि हम बुनियादी ढांचे के विकास की होड़ में प्रकृति के बुनियादी नियमों को भूलते जा रहे हैं।

पश्चिमी घाट जैसी यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल जगहों पर, जहां गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियों ने पहले ही सीमित मानवीय हस्तक्षेप की वकालत की थी, वहां इस तरह की लापरवाही अक्षम्य है। सुरंगों का निर्माण करते समय भू-तकनीकी सुरक्षा को प्राथमिकता देने के बजाय गति और मुनाफे को आगे रखा जाता है, जिसका खामियाजा अंततः निर्दोष मजदूरों और स्थानीय निवासियों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है। इस घटना के बाद स्थानीय जनता में भारी आक्रोश है।

खुद प्रशासन के शीर्ष अधिकारी (जिला कलेक्टर) के आदेशों की अवहेलना करना यह दर्शाता है कि निर्माण कंपनियों के भीतर नियमों के प्रति कितना कम सम्मान है। विशेषज्ञों की मांग है कि इस मामले को केवल ‘प्राकृतिक दुर्घटना’ मानकर बंद न किया जाए, बल्कि जिम्मेदार कंपनियों और अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज होना चाहिए। जब तक ऐसी घटनाओं में अनुकरणीय दंड नहीं दिया जाएगा, तब तक सुरक्षा नियमों का उल्लंघन इसी तरह होता रहेगा। वायनाड का यह हादसा देश भर में चल रही सभी पहाड़ी विकास परियोजनाओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है। साथ ही जिम्मेदारी तय नहीं होने की बीमारी से भी ऐसी प्रवृत्ति सतत चलती रहेगी।