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कट मनी का सवाल टीएमसी से भाजपा तक

राम मंदिर में हुई चोरी को लेकर हाल ही में जारी आधिकारिक जानकारी को देखकर ऐसा लगता है कि तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी को चुनकर हम आसमान से गिरे और खजूर पर अटके हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जिस कट मनी राज को खत्म करने का दावा नरेंद्र मोदी ने बड़े गर्व से किया था, वही व्यवस्था अयोध्या में राम मंदिर का प्रबंधन करने वाले उनके श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को चला रही थी।

मंदिर के कम से कम 125 कर्मचारियों की भर्ती केवल कट मनी देने के बाद ही की गई थी। इस मामले पर असदुद्दीन ओवैसी ने आधे मजाकिया अंदाज में सलाह देते हुए कहा था कि उन्हें ट्रस्ट में एक मुस्लिम को रखना चाहिए था और उसका एनकाउंटर करके तथा उसका घर बुलडोजर से ढहाकर इस मामले को हमेशा के लिए रफा-दफा कर देना चाहिए था।

उन्होंने इसके साथ एक और बात जोड़ी, चंपत मजे कर रहे हैं!, उनका इशारा चंपत राय की तरफ था, जिनसे मंदिर में हुई इस चोरी के सिलसिले में पूछताछ की जा रही है, लेकिन ट्रस्ट के महासचिव पद से उनके अचानक इस्तीफे के फैसले ने कई दिलचस्प सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया है।

ट्रस्ट के कुछ उन पदाधिकारियों के पास अचानक से आए बेहिसाब खर्च करने योग्य पैसे पर भी यह लागू होती है, जिन्हें कोई बहुत मोटी तनख्वाह नहीं मिलती थी। इस मामले में बहुत कम जानकारी सामने आ पाई है, क्योंकि अधिकारियों ने इस पर जिस तरह की प्रतिक्रिया देने का विकल्प चुना, वह केवल संदेह और अविश्वास को ही जन्म दे सकता है। आधिकारिक जांच में बताया गया कि लगभग 7 करोड़ से 7.5 करोड़ रुपये का गबन हुआ है।

तलाशी में 79.85 लाख रुपये बरामद हुए; लेकिन विपक्षी राजनीतिक दलों का कहना है कि चोरी की गई कुल रकम 200 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। अरविंद केजरीवाल, जो एक पूर्व राजस्व अधिकारी रहे हैं और सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने के लिए रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं, और जो अब एक प्रमुख विपक्षी चेहरा हैं, उन्होंने इसे एक महा डकैती करार दिया है। इसके विपरीत, एक ऐसी सरकार जिसका हर मामले में दखल रहता है, वह शायद इस पूरे मामले को जानबूझकर बेहद दबाकर रखने की कोशिश कर रही है।

सरकार अपने अनुभवों और उदाहरणों से, विशेष रूप से 2002 के गुजरात दंगों के बाद यह अच्छी तरह जानती है कि मुस्लिम समुदाय का आक्रोश चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, एक अरब जागृत हिंदुओं के गुस्से का परिणाम बहुत अलग और भयानक हो सकता है। जैसे-जैसे आप समाज की सीढ़ियां चढ़ते हैं, चीजें बदल जाती हैं।

राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के दो साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अमित शाह द्वारा अयोध्या के राम मंदिर का दौरा न करने पर केजरीवाल की हैरानी (जबकि वह रामचंद्र जी को भगवान मानते हैं) या तो केवल एक दिखावा है या फिर गृह मंत्री को असहज करने के लिए चली गई एक सोची-समझी चाल है।

हवा चाहे जिस तरफ भी बहे, इस पूरे घटनाक्रम से तीन स्पष्ट और अपरिहार्य सबक मिलते हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। सरकार द्वारा कुशल प्रबंधन के तमाम दावों के बावजूद, राम मंदिर का यह घोटाला कर्मचारियों को अनुशासित करने और उनके कर्तव्यों का कड़ा हिसाब रखने में सरकार की घोर असमर्थता को उजागर करता है। दूसरा, यदि इस पूरे मामले का धार्मिक और भक्ति पक्ष फर्जी नहीं होता, तो ऐसा कतई नहीं होता। अंत में, जब जिम्मेदारी से बचने की बात आती है, तो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई खास अंतर देखने को नहीं मिलता।

सरकार और उसके अधिकारी इसमें सबसे आगे हैं, जो जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। एक चौथा सबक भी है, जिस पर विचार करने में हिचकिचाहट होती है। वह यह अफवाह है कि गिरफ्तार किए गए आठ लोग महज छोटी मछलियां हैं, और असली गुनाहगार पूरी तरह से आजाद घूम रहे हैं। सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली जानकारी के बिना कोई नहीं जानता कि संदेह की सुई किस तरफ घूम सकती है।

सरकार आखिरकार अपनी चुप्पी कब तोड़ेगी और इस मामले को पूरी तरह साफ करेगी? दरअसल इस सरकार में जिम्मेदारीं नहीं लेने की पुरानी बीमारी है। लिहाजा चुप्पी साधी जा रही है। फिर भी पश्चिम बंगाल में जिस कट मनी का उल्लेख श्री मोदी ने बार बार किया था, अयोध्या के मामले में उनकी लगातार चुप्पी उनके अपने दोहरे मापदंड को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त है। यहां पर उनका पैमाना अलग हो गया है और वह हर बार की तरह इस मामले में भी चुप्पी साधे बैठे है।