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ममता के चेहरे के बिना राजनीति का पूर्व इतिहास

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक अत्यंत दिलचस्प और जटिल दौर से गुजर रही है। सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के भीतर से असंतोष के सुर जिस तरह उभरकर सामने आ रहे हैं, उसने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। हाल ही में बागी खेमे के प्रमुख चेहरों में से एक, ऋतब्रत बंदोपाध्याय द्वारा दिया गया बयान राजनीतिक रूप से बेहद मायने रखता है।

ऋतब्रत ने कहा कि वे चाहते हैं कि ममता बनर्जी पार्टी के भीतर उनके विपक्षी समूह के लिए एक मार्गदर्शक या सलाहकार की भूमिका में बनी रहें। यह बयान कोई सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह एक बेहद सोची-समझी और रणनीतिक चाल का हिस्सा है, जिसे ममता के प्रति वफादारी का मुखौटा पहनकर खेला जा रहा है।

इस रणनीति के पीछे चार प्रमुख कारक काम कर रहे हैं। सबसे पहला और महत्वपूर्ण कारक यह है कि बागी नेता खुद को अपरेशन लोटस या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा प्रायोजित किसी साजिश के हिस्से के रूप में नहीं दिखाना चाहते। लेकिन भूपेंद्र यादव के घर की तस्वीर ने कहानी का सच बयां कर दिया है।

दरअसल, विद्रोहियों का वास्तविक निशाना ममता बनर्जी नहीं, बल्कि पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी हैं। ऋतब्रत और उनके सहयोगियों का सीधा हमला आई-पैक जैसी पेशेवर एजेंसियों के माध्यम से चलाई जा रही चुनावी राजनीति और तृणमूल कांग्रेस के बढ़ते कॉरपोरेटाइजेशन (निगमकीकरण) पर है।

बागी नेताओं का तर्क है कि जिस पार्टी का निर्माण ममता बनर्जी ने पसीने और जमीनी संघर्ष से किया था, उसे अब सलाहकारों, बंद कमरों की संस्कृति और केंद्रीकृत निर्णय लेने वाली व्यवस्था के हवाले कर दिया गया है। इस प्रक्रिया में जिलों के जमीनी कार्यकर्ताओं को उपेक्षित, अपमानित और स्थानीय पुलिस के माध्यम से प्रताड़ित किया जा रहा है।

रणनीति यह है कि अभिषेक बनर्जी चूंकि विधायक नहीं हैं और विधानसभा के भीतर विधायी पार्टी संरचना से सीधे तौर पर नहीं जुड़े हैं, इसलिए उनके और ममता बनर्जी के बीच एक राजनीतिक दूरी पैदा की जाए। बागी गुट ममता बनर्जी पर यह दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि वे अभिषेक बनर्जी और इस कॉरपोरेट कार्यशैली के खिलाफ कार्रवाई करें, तभी वे पार्टी में बने रहेंगे। वे एक ऐसे विपक्षी स्पेस को हथियाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे तृणमूल ने पिछले कई वर्षों में न तो कांग्रेस और न ही वामपंथियों को

लेकिन, राजनीति का इतिहास बहुत निर्मम होता है और बंगाल की राजनीति तो प्रतीकों और भावनाओं पर चलती है। बागी नेताओं की यह ममता-मुग्धता और कुछ नहीं, बल्कि जनता के आक्रोश से बचने का एक सुरक्षा कवच है। ऋतब्रत और उनका गुट भली-भांति जानता है कि बंगाल में ममता बनर्जी के नाम और चेहरे के बिना कोई भी क्षेत्रीय नेता अपनी राजनीतिक नैया पार नहीं लगा सकता।

अतीत में जिन नेताओं ने भी ममता बनर्जी की तस्वीर को अपने पीछे से हटाने या उनके नेतृत्व को खारिज करने दुस्साहस किया, उनका राजनीतिक हश्र बेहद दर्दनाक रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो मुकुल रॉय का नाम सबसे पहले सामने आता है। एक समय वे तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता और पार्टी के चाणक्य माने जाते थे।

जब उन्होंने वर्तमान संगठनात्मक ढांचे से असहज होकर पार्टी छोड़ी और भाजपा का दामन थामा, तब उन्होंने अपने पीछे से दीदी का हाथ और उनकी तस्वीर दोनों हटा दी। परिणाम क्या हुआ? भाजपा में जाने के बाद वे कभी भी सहज नहीं रह पाए। उन्हें वह संगठनात्मक सम्मान और स्वतंत्रता कभी नहीं मिली जो तृणमूल में हासिल थी।

अंततः, एक राजनीतिक चक्र पूरा करके वे वापस तृणमूल के दरवाजे पर खड़े दिखाई दिए, लेकिन तब तक उनका राजनीतिक कद और प्रासंगिकता पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। यही हाल शुभेंदु अधिकारी के उभार के समय भी देखा गया। नंदीग्राम आंदोलन के नायक रहे शुभेंदु जब ममता बनर्जी का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल हुए, तो उन्होंने एक समय बंगाल की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान का दावा किया था।

आज वह भले ही मुख्यमंत्री बन चुके हैं पर ममता की लोकप्रियता के आगे टिक नहीं पाते हैं। बंगाल की जनता का मिजाज ऐसा है कि वह ममता बनर्जी को एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक भावना के रूप में देखती है। जैसे ही किसी नेता के पीछे से ममता बनर्जी का नाम और तस्वीर हटती है, जनता उसे विश्वासघाती के रूप में देखने लगती है। ऐसे में दिल्ली में बैठकर कर रहे सांसदों को भले ही ईडी या किसी अन्य सरकार एजेंसी का भय हो पर सभी अच्छी तरह जानते हैं कि ममता के चेहरा पीछे से हटा तो जनता के बीच उनकी छवि क्या बन जाएगी