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ऋतव्रत को नेता प्रतिपक्ष बनाने के फैसले पर राजनीति जारी

कलकत्ता उच्च न्यायालय में टीएमसी की याचिका

  • गत 28 वर्षों में पहला विभाजन

  • बागी गुट में भी ममता के समर्थन

  • फर्जी हस्ताक्षर पर फंस गया मामला

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रतिंद्र बोस द्वारा बागी नेता ऋतव्रत बनर्जी को सदन में विपक्ष का नेता के रूप में मान्यता देने के निर्णय को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया है। पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी ने बताया कि ममता बनर्जी की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह फैसला लिया गया और पार्टी सोमवार, 8 जून 2026 को अदालत का दरवाजा खटखटाएगी।  यह राजनीतिक घटनाक्रम टीएमसी के 28 वर्षों के इतिहास में पार्टी के भीतर आए सबसे बड़े संकट को दर्शाता है। 3 जून 2026 को पार्टी के 80 में से 58 बागी विधायकों ने एक अलग गुट बना लिया और निष्कासित नेता ऋतव्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया।  विधानसभा अध्यक्ष ने बागी गुट के दावे को स्वीकार करते हुए ऋतव्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया।  टीएमसी का कहना है कि अध्यक्ष का निर्णय स्थापित संसदीय मानदंडों और नियमों के खिलाफ है। पार्टी के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया अवैध है और इसमें संवैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया है।

ऋतव्रत बनर्जी ने आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि उन्होंने सभी संवैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया है। उन्होंने कहा कि उनके पास पार्टी के दो-तिहाई विधायकों का समर्थन है, जो दलबदल विरोधी कानून के तहत एक अलग गुट के रूप में मान्यता पाने के लिए आवश्यक है।

यह संकट तब गहरा गया जब टीएमसी के आधिकारिक उम्मीदवार शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नामांकन पत्र पर कथित तौर पर फर्जी हस्ताक्षर होने का मामला सामने आया। इसके बाद ऋतव्रत बनर्जी और संदीप साहा ने अध्यक्ष को शिकायत की, जिसके बाद दोनों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में टीएमसी से निष्कासित कर दिया गया। वर्तमान में टीएमसी का यह गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहा है, जबकि बागी गुट ने विधानसभा में अपनी एक अलग विपक्ष की संरचना तैयार कर ली है। पार्टी ने इस आंतरिक कलह के बीच अपना संगठनात्मक ढांचा भी बदल दिया है और कई नए पदों पर नियुक्तियां की हैं।