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राम मंदिर दान पर अदालत संज्ञान लेः अखिलेश यादव

सरकार की चुप्पी अजीब है और सूचनाएं दबायी जा रही है

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः अयोध्या के भव्य राम मंदिर में राम भक्तों द्वारा अर्पित की गई दान राशि को लेकर एक नया और गंभीर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रविवार, 7 जून 2026 को राम मंदिर निर्माण और प्रबंधन से जुड़ी संस्था, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर दान की राशि में करोड़ों रुपये की हेराफेरी करने का गंभीर आरोप लगाया है।

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तीखी टिप्पणी करते हुए इस मुद्दे को दुनिया भर के करोड़ों सनातनियों और राम भक्तों की आस्था से सीधे जुड़ा हुआ बताया। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील और शर्मनाक है कि मंदिर के नाम पर एकत्र किए गए चढ़ावे में से एक बड़ा हिस्सा गायब है। उन्होंने न केवल इस मामले की पारदर्शिता पर प्रश्न उठाए, बल्कि ट्रस्ट और उत्तर प्रदेश सरकार की चुप्पी को भी अत्यंत संदिग्ध करार दिया। यादव ने अपनी मांग दोहराते हुए कहा कि चूंकि यह मामला जन-आस्था और करोड़ों रुपयों के सार्वजनिक चंदे से जुड़ा है, इसलिए माननीय न्यायालय को इस पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और एक उच्च-स्तरीय निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।

सपा की ओर से इस मामले में पार्टी के पूर्व विधायक पवन पांडे ने और अधिक विस्तार से दावे पेश किए हैं। पांडे ने आरोप लगाया कि हेराफेरी की यह राशि 5 से 7.5 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है। उन्होंने ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे निर्दोष हैं, तो उन्हें प्रभु श्री राम के नाम पर शपथ लेकर इन आरोपों का खंडन करना चाहिए और सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना चाहिए।

विवाद के तूल पकड़ने पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट का कामकाज पूरी तरह से पारदर्शी और व्यवस्थित है। उन्होंने जानकारी दी कि ट्रस्ट के खातों का नियमित अंतराल पर आंतरिक ऑडिट होता है और इसके साथ ही भारतीय स्टेट बैंक द्वारा भी इसकी कड़ी निगरानी और ऑडिट प्रक्रिया पूरी की जाती है। चंपत राय ने आश्वस्त किया कि वर्तमान में भी ऑडिट की प्रक्रिया चल रही है और अब तक की रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की उल्लेखनीय विसंगति या अनियमितता सामने नहीं आई है। बहरहाल, इस आरोप-प्रत्यारोप के दौर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर से गर्मा दिया है।