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अब आरएसएस की राय का समर्थन किया जनरल नरवणे ने

पहले अपनी अप्रकाशित किताब के हिस्से को लेकर चर्चा में थे

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः भारत-पाकिस्तान संबंधों के भविष्य को लेकर एक नई और महत्वपूर्ण बहस को जन्म देती है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) मनोज मुकुंद नरवणे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के उस बयान का समर्थन किया है, जिसमें पाकिस्तान के साथ बातचीत की खिड़की खुली रखने और पीपल-टू-पीपल कांटेक्ट (जन-स्तर पर संपर्क) की वकालत की गई थी।

जनरल नरवणे ने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान कहा कि सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं जिनकी बुनियादी समस्याएं—रोटी, कपड़ा और मकान—एक जैसी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आम आदमी का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होता। नरवणे के अनुसार, जब दो देशों के लोगों के बीच मित्रता होगी, तभी दोनों देशों के बीच भी मित्रता संभव है।

यह बयान दत्तात्रेय होसबोले के उस साक्षात्कार के संदर्भ में आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने भारत का विश्वास खो दिया है, इसलिए अब नागरिक समाज को आगे आकर रास्ता दिखाना चाहिए। होसबोले ने पीपल-टू-पीपल संपर्क को दोनों देशों के बीच बने गतिरोध को तोड़ने की कुंजी बताया था।

पूर्व सेना प्रमुख ने सुझाव दिया कि भारत और पाकिस्तान के बीच गैर-आधिकारिक स्तर पर बातचीत या खेल आयोजनों के माध्यम से संपर्क स्थापित होना चाहिए। उनका मानना है कि हमारे लोगों को भी यह जानने की जरूरत है कि सीमा पार रहने वाले हर व्यक्ति कट्टर दुश्मन नहीं हैं। यह एक मानवीय दृष्टिकोण है जो अक्सर सैन्य और राजनीतिक शत्रुता के बीच दब जाता है।

अपनी सादगी भरी अपील के बावजूद, जनरल नरवणे ने राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति भारत के कड़े रुख को स्पष्ट रखा। उन्होंने कहा कि विवादों का समाधान चर्चा के माध्यम से होना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम सैन्य बल का उपयोग नहीं कर सकते। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, भारत वह देश है जो शांति की भाषा बोलता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम बल प्रयोग करने में संकोच नहीं करेंगे।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब नरवणे अपनी नई पुस्तक क्यूरियस एंड क्लासिफायेड, अनअर्थिंग मिलिटरी मिथस एंड मिस्ट्रिरीज के माध्यम से सैन्य मिथकों और रहस्यों को उजागर कर रहे हैं। उनके इस समर्थन को रणनीतिक हलकों में भारत की विदेश नीति के प्रति एक यथार्थवादी और मानवीय संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।