भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट से अर्थव्यवस्था पर चिंता
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अनिश्चितता का बढ़ता आंकड़ा
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खाने-पीने के खर्च में कटौती
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डिजिटल इंडिया बनाम नकद की वापसी
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः एसबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, लोग न केवल दैनिक खर्चों के लिए बल्कि आपातकालीन स्थितियों के लिए भी अपने पास भारी मात्रा में कैश जमा कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह पैसा किसी अतिरिक्त आय से नहीं, बल्कि घरेलू खर्चों और भोजन के बजट में कटौती करके जुटाया जा रहा है।
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2022-23 में एक औसत व्यक्ति किसी भी अनिश्चितता से निपटने के लिए अपने पास केवल 532 रखता था। यह राशि वित्तीय वर्ष 2024-25 में बढ़कर 4,666 हुई और अब 2025-26 में यह उछलकर 9,127 रुपये तक पहुंच गई है। यह बढ़त दर्शाती है कि भविष्य को लेकर आम जनता में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।
केंद्र सरकार की रिपोर्ट भी इस चिंताजनक स्थिति की पुष्टि करती है। बढ़ती महंगाई के कारण लोग अपने भोजन पर होने वाले खर्च को कम करने पर मजबूर हैं। ग्रामीण क्षेत्र में 2012 में भोजन पर मासिक खर्च 53 फीसद था, जो अब घटकर 47 फीसद रह गया है। शहरी क्षेत्र में गिरावट और भी अधिक है। 2012 के 47 प्रतिशत के मुकाबले अब लोग अपनी आय का केवल 40 प्रतिशत भोजन पर खर्च कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 12 वर्षों में पैकेट बंद खाद्य पदार्थों और दैनिक वस्तुओं की कीमतों में इतनी वृद्धि हुई है कि लोगों को अपनी बुनियादी जरूरतों से समझौता करना पड़ रहा है।
एक ओर जहाँ सरकार डिजिटल लेनदेन और कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा दे रही है, वहीं एसबीआई की यह रिपोर्ट एक विपरीत तस्वीर पेश करती है। नोटबंदी और ₹2000 के नोटों को वापस लेने जैसे अनुभवों के बावजूद, लोगों का बैंकिंग प्रणाली या डिजिटल वॉलेट के बजाय भौतिक नकदी पर भरोसा बढ़ना सुखद संकेत नहीं है। एसबीआई के अनुसार, वैश्विक युद्ध की स्थितियां या सोशल मीडिया पर फैल रही अनिश्चितता की खबरें इसके पीछे के संभावित कारण हो सकते हैं।