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केजरीवाल ने न्यायपालिका को आइना दिखाया है

दिल्ली की सियासत और न्यायपालिका के गलियारों में इन दिनों शराब नीति का मामला महज एक कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह सिद्धांतों, धारणाओं और संस्थागत निष्पक्षता के बीच एक जटिल द्वंद्व बन चुका है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और जांच एजेंसियों के बीच की यह रस्साकशी अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां न्याय की तराजू के दोनों पलड़ों पर सवालिया निशान उठने लगे हैं।

हालिया घटनाक्रमों ने, विशेषकर दिल्ली उच्च न्यायालय की पीठ और जांच एजेंसियों के बीच के तालमेल ने एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है। पिछले दो वर्षों से हजारों करोड़ के घोटाले का जो शोर सुनाई दे रहा है, वह कानूनी फाइलों में अब भी ठोस सबूतों के लिए तरस रहा है। प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई ने सैकड़ों छापेमारी की, दर्जनों गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन आज भी एक बुनियादी सवाल हवा में तैर रहा है—वह कथित रिश्वत का पैसा गया कहां?

जब प्रचार और दावों के बीच साक्ष्यों का फासला इतना बढ़ जाए, तो अदालतों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। लेकिन यहाँ प्रक्रियात्मक न्याय की जगह प्रक्रिया ही सजा बनती दिख रही है। इस मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब निचली अदालत ने जांच प्रक्रिया में खामियां पाते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां कीं और कार्रवाई के निर्देश दिए। यह निचली अदालत के विवेक का हिस्सा था, जिसने पाया कि शायद जांच का तरीका निष्पक्ष नहीं था। लेकिन न्यायशास्त्र के सामान्य सिद्धांतों से परे, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने बिजली की गति से इस निर्देश पर स्थगन लगा दिया।

यह केवल एक न्यायिक आदेश नहीं था, बल्कि इसने उस संदेश को बल दिया कि जांच एजेंसियों की गलतियों पर भी शील्ड लगाई जा रही है। जब उच्च न्यायालय निचली अदालत की उस निगरानी शक्ति को ही कुंद कर दे जो जांच की शुचिता सुनिश्चित करती है, तो आरोपी के मन में असुरक्षा का भाव पैदा होना स्वाभाविक है।

सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत न मिलने के बाद, मुख्यमंत्री केजरीवाल ने न्यायमूर्ति शर्मा की अदालत में स्वयं बहस करने का निर्णय लिया। यह एक असाधारण कदम था, जो न्यायपालिका के प्रति उनके अविश्वास और हताशा दोनों को दर्शाता है। अदालत में केजरीवाल ने जिन सात बड़े आरोपों को रखा, वे केवल कानूनी आपत्तियां नहीं थीं, बल्कि एक न्यायाधीश की व्यक्तिगत और वैचारिक पृष्ठभूमि पर सीधा प्रहार थीं।

न्यायमूर्ति शर्मा के अधिवक्ता परिषद जैसे संगठनों के साथ जुड़ाव और उनके परिवार के सदस्यों का केंद्र सरकार के विधिक पैनलों से जुड़े होने के तथ्य सार्वजनिक होने के बाद, न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए वाला सिद्धांत धुंधला पड़ता नजर आ रहा है।

जब किसी न्यायाधीश के परिवार के हित सीधे केंद्र सरकार से जुड़े हों जो मामले में मुख्य अभियोजक है, तो निष्पक्षता की कसौटी अत्यंत कठोर हो जाती है। संपादकीय दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला अब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से कहीं बड़ा हो चुका है। यह सवाल उठाता है कि क्या हमारी उच्च न्यायपालिका जांच एजेंसियों के प्रति अनावश्यक रूप से उदार हो गई है?

केजरीवाल का यह तर्क कि फैसला आने से पहले ही गृह मंत्री को परिणाम पता होता है, लोकतंत्र के लिए एक भयावह संकेत है। यदि कार्यपालिका को न्यायपालिका के अगले कदम का पूर्वानुमान है, तो यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की विफलता है। अदालत ने सरकारी गवाहों के बयानों को जिस तरह परम सत्य मान लिया है, वह भी कानूनी बहस का विषय है।

एक ऐसा गवाह, जिसे दबाव या प्रलोभन के तहत अपनी ही बात बदलने पर मजबूर किया गया हो, उसकी गवाही पर किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महीनों तक बाधित करना क्या न्यायसंगत है? न्यायपालिका लोकतंत्र का अंतिम रक्षक है। लेकिन जब अदालतें एजेंसियों की प्रेस रिलीज और जांच अधिकारियों की मनमानी को न्यायिक संरक्षण देने लगें, तो संविधान का मूल ढांचा हिलने लगता है।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ उठाए गए सवाल केवल एक व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे उस व्यवस्था के खिलाफ हैं जो पारदर्शिता के बजाय तकनीकी बारीकियों के पीछे छिप रही है। दिल्ली शराब नीति मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब समय आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट को इन प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि राजनीतिक द्वेष की लड़ाई में न्याय की शुचिता बलि न चढ़ जाए। अंततः, जनता का विश्वास ही न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति है, और यदि वह विश्वास खंडित होता है, तो लोकतंत्र की नींव को बचाना असंभव होगा।