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फ्रीडम फाइटर से शिक्षक सभी के नाम गायब

आयोग और अदालत में अजीब किस्म की चुप्पी

  • बारह बार पहले मतदान किया था

  • आयोग में सारे दस्तावेज जमा किये

  • कहीं से कोई सुनवाई नहीं की गयी

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जहाँ दशकों से मतदान कर रहे नागरिकों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। स्टैच्यूटरी आइडेंटिटी वेरिफिकेशन की इस प्रक्रिया ने न केवल विभाजन के समय आए शरणार्थियों को प्रभावित किया है, बल्कि उन सरकारी कर्मचारियों को भी नहीं बख्शा है जो खुद दर्जनों चुनावों में मतदान अधिकारी रहे हैं।

कोलकाता के नारकेलडांगा की रहने वाली सुबर्णा बाला पोद्दार (97 वर्ष) का जन्म अविभाजित बंगाल में हुआ था और 1947 के विभाजन के बाद वे भारत आई थीं। उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं छोड़ा, लेकिन इस बार उनका नाम मतदाता सूची में नहीं है। उनके परिवार ने बताया कि 2002 की मतदाता सूची में नाम की एक छोटी सी स्पेलिंग गलती (स्वर्णा बाला) के कारण उनकी सुनवाई हुई और उनके दस्तावेज खारिज कर दिए गए। उन्होंने वोटर आईडी, आधार कार्ड, बैंक पासबुक और विधवा पेंशन के रिकॉर्ड जमा किये। बाद में फॉर्म 6 के माध्यम से नया आवेदन भी विफल रहा। उनके परिवार के आठ सदस्यों में से अब केवल चार ही मतदान कर पाएंगे।

हुगली जिले में एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एस. अशरफुल हक, जो एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं और 12 चुनावों में खुद पीठासीन अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, का नाम भी हटा दिया गया है। हक ने बताया, मेरे पास 1944 के पुश्तैनी भूमि रिकॉर्ड हैं। मेरे माता-पिता का नाम 1956 की मतदाता सूची में था। मेरे पास पासपोर्ट, पैन कार्ड, आधार कार्ड और बैंक के कागज हैं। इसके बावजूद मुझे बिना कारण बताए सुनवाई के लिए बुलाया गया और फिर नाम हटा दिया गया। उन्होंने अब इस फैसले के खिलाफ ट्रिब्यूनल में अपील की है।

नादिया जिले के राणाघाट में इस प्रक्रिया का सबसे दुखद पहलू सामने आया। जीबनकृष्ण विश्वास (68 वर्ष) नामक व्यक्ति की उस समय मौत हो गई जब वे अपने और अपनी बेटी के नाम काटे जाने के खिलाफ अपील करने के लिए एसडीओ कार्यालय के बाहर कतार में खड़े थे। उनके परिवार का आरोप है कि दस्तावेजों की भागदौड़ और मानसिक तनाव के कारण उन्हें दिल का दौरा पड़ा। इस घटना के बाद तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और इसे राजनीतिक हत्या करार दिया।

जमीनी स्तर पर काम करने वाले एजेंटों के अनुसार, कई बूथों पर मतदाताओं की संख्या में भारी गिरावट आई है। उदाहरण के लिए, एक क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या 1,326 से घटकर 1,092 रह गई है। लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि: सुनवाई के नोटिस में कोई ठोस कारण नहीं बताया जा रहा है। दशकों पुराने और वैध दस्तावेजों को भी अपर्याप्त माना जा रहा है। एडजुडिकेशन (निर्णयाधीन) से सीधे डिलीशन (नाम हटाना) की प्रक्रिया बहुत अचानक हो रही है। बंगाल के कई जिलों में अब मतदाता सूची में नाम वापस लाने की यह कोशिश कार्यालयों, लंबी कतारों और कागजी कार्रवाई की एक कठिन दौड़ में बदल गई है, जहाँ सफलता की कोई गारंटी नहीं दिख रही।