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पश्चिम बंगाल शुद्धिकरण नहीं यह मताधिकार हनन है

पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारत निर्वाचन आयोग द्वारा क्रियान्वित विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया एक बड़े विवाद और संवैधानिक बहस के केंद्र में आ गई है। वैसे तो किसी भी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए मतदाता सूची का शुद्धिकरण एक अनिवार्य और सामान्य अभ्यास है, जिसका उद्देश्य मृत, अनुपस्थित, स्थानांतरित या नकली (डुप्लिकेट) मतदाताओं को हटाकर केवल वास्तविक मतदाताओं की सूची तैयार करना होता है।

लेकिन बंगाल में इस बार जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और इसकी समावेशी प्रकृति पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।  निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में संपन्न की गई न्यायनिर्णयन प्रक्रिया के बाद जो संख्यात्मक डेटा सामने आया है, वह चौंकाने वाला है। राज्य भर में कुल 60.06 लाख मतदाताओं को गहन जांच या न्यायनिर्णयन की श्रेणी में रखा गया था।

अंतिम रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से 27,16,393 मतदाताओं को अपात्र घोषित कर सूची से बाहर कर दिया गया है। यह संख्या उन 58.25 लाख नामों के अतिरिक्त है, जिन्हें पिछले साल दिसंबर में प्रकाशित ड्राफ्ट रोल के दौरान ही हटा दिया गया था। उस समय विलोपन के प्राथमिक आधार मृत्यु, अनुपस्थिति, पलायन या दोहरी प्रविष्टियाँ थे।

यदि इन दोनों चरणों के आंकड़ों को जोड़ दिया जाए, तो बंगाल की मतदाता सूची में कुल मिलाकर लगभग 91 लाख (90.91 लाख) मतदाताओं की कमी आई है। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे में, चुनाव से ठीक पहले एक ही राज्य में इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का कम होना प्रशासनिक दक्षता से अधिक व्यापक मताधिकार के विलोपन का संकेत देता है।

यद्यपि मतदाता सूची से नाम हटाने की यह प्रक्रिया सैद्धांतिक रूप से सभी समुदायों और क्षेत्रों के लिए समान होनी चाहिए, लेकिन उपलब्ध डेटा एक अलग और चिंताजनक कहानी बयां करता है। यह विलोपन सभी धार्मिक सीमाओं को पार तो करता है, लेकिन इसका प्रभाव भौगोलिक और जनसांख्यिकीय रूप से काफी असंतुलित है।

मुर्शिदाबाद मुस्लिम बहुल जिला है, जहाँ विलोपन की प्रक्रिया का सबसे अधिक और विषम प्रभाव देखा गया। यहां कुल 11,01,145 मतदाताओं को जांच के घेरे में रखा गया था, जिनमें से 4,55,137 (लगभग 41 फीसद) मतदाताओं को अंततः अपात्र घोषित कर दिया गया।

सबसे चौंकाने वाले आंकड़े नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से सामने आए हैं, जो शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के राजनीतिक द्वंद्व के कारण अत्यंत संवेदनशील सीट मानी जाती है। यहां मुस्लिम मतदाता कुल आबादी का लगभग 25 प्रतिशत हैं, लेकिन चुनाव आयोग द्वारा प्रकाशित सात पूरक सूचियों के अनुसार, कुल विलोपन में से 95 प्रतिशत मामले इसी समुदाय से संबंधित हैं।

यह असंतुलन ही है जो विशेष गहन संशोधन की मंशा और उसकी कार्यप्रणाली पर नागरिकों के बीच गहरे अविश्वास को जन्म दे रहा है। इन परिस्थितियों के बीच, पश्चिम बंगाल सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। सरकार ने उन मैप्ड मतदाताओं के लिए अंतरिम राहत की मांग की थी जिनके नाम हटा दिए गए हैं।

मैप्ड मतदाता वे नागरिक हैं जिन्होंने 2002 के पिछले एसआईआर के बाद अपने या अपने पूर्वजों के नामों को सफलतापूर्वक मतदाता सूची से लिंक किया था। सरकार का तर्क था कि विलोपन की विशाल मात्रा और न्यायाधिकरणों के पास समय की अत्यधिक कमी को देखते हुए हस्तक्षेप आवश्यक है।

राज्य भर में विलोपन से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए 19 न्यायाधिकरण स्थापित किए गए हैं। विडंबना यह है कि अब तक इनमें से केवल दो मामलों का समाधान हुआ है, और वे दोनों मामले चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों से संबंधित थे। आम नागरिक, जो खुद को वैध मतदाता होने का दावा कर रहे हैं, उनके पास अब अपनी नागरिक पहचान और मतदान का अधिकार साबित करने के लिए समय और संसाधन दोनों का अभाव है।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को बंगाल सरकार की इस याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, पीठ के एक न्यायमूर्ति ने आश्वासन दिया कि अपीलीय न्यायाधिकरण संवैधानिक विशेषाधिकारों के प्रति सचेत रहेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लाखों लोगों के लिए मतदान का अधिकार अब अनिश्चितता के भंवर में है।

91 लाख मतदाताओं की कटौती किसी भी राज्य की राजनीति और शासन की दिशा बदल सकती है। यदि यह प्रक्रिया त्रुटिहीन और केवल अवैध प्रविष्टियों को हटाने तक सीमित होती, तो इसे एक उपलब्धि माना जाता। किंतु डेटा में दिख रहा सांप्रदायिक और क्षेत्रीय झुकाव, और न्यायाधिकरणों की सुस्त रफ्तार इस आशंका को पुख्ता करती है कि बड़ी संख्या में वैध नागरिकों को उनकी इच्छा के विरुद्ध चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है। लोग इसके पक्ष में अनेक दलीलें दे सकते हैं पर लाखों लोगों के मताधिकार छीन जाने के बाद इसे लोकतांत्रिक उपलब्धि कहना कठिन होगा।