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पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर पूरी ताकत लगा रहा चुनाव आयोग

अब 170 थाना प्रभारियों और 83 बीडीओ का तबादला

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के मद्देनजर चुनाव आयोग ने राज्य के प्रशासनिक और पुलिस ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा फेरबदल किया है। रविवार को जारी एक आदेश के तहत आयोग ने राज्य के 170 थाना प्रभारियों सहित कुल 184 पुलिस अधिकारियों और 83 ब्लॉक विकास अधिकारियों का तत्काल प्रभाव से तबादला कर दिया है। इस कार्रवाई की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर और विपक्ष के नेता शुभेंद्रु अधिकारी के गढ़ नंदीग्राम के थाना प्रभारियों को भी हटा दिया गया है।

चुनाव आयोग का यह कदम राज्य में निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान सुनिश्चित करने की दिशा में एक कड़ा संदेश माना जा रहा है। दूसरी तरफ दूसरे राजनीतिक दल इसे भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के तौर पर आंक रहेहैं। तबादलों की इस सूची में न केवल कोलकाता के महत्वपूर्ण थाने शामिल हैं, बल्कि कूचबिहार का शीतलकुची जैसा संवेदनशील इलाका भी है, जो पिछले चुनावों में हिंसा का केंद्र रहा था। पुलिस प्रशासन के साथ-साथ नागरिक प्रशासन में भी भारी फेरबदल हुआ है। नंदीग्राम के दो ब्लॉकों सहित राज्य के 83 ब्लॉकों के बीडीओ और सहायक रिटर्निंग अधिकारियों को बदल दिया गया है।

आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक प्रशासनिक बदलाव पूर्वी मेदिनीपुर जिले में देखे गए हैं, जहाँ 14 बीडीओ और सहायक रिटर्निंग अधिकारियों का तबादला किया गया है। इसके बाद दक्षिण 24 परगना का नंबर आता है, जहाँ 11 अधिकारियों को हटाया गया है। इसके अलावा मालदा, मुर्शिदाबाद, जलपाईगुड़ी और उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर में भी बड़े पैमाने पर नियुक्तियां की गई हैं।

महत्वपूर्ण नियुक्तियों पर नजर डालें तो भवानीपुर थाना में एसटीएफ शाखा में तैनात रहे सौमित्र बसु को यहाँ का नया प्रभारी बनाया गया है। नंदीग्राम थाना में चंदननगर में कार्यरत रहे शुभब्रत नाथ को नंदीग्राम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। टाला थाना विवाद में आरजी कर कांड के समय चर्चा में रहे टाला थाने के पूर्व प्रभारी अभिजीत मंडल को लेकर आयोग ने अपनी पिछली अधिसूचना में सुधार किया है। अब वे मानिकतला के बजाय पर्नश्री थाने में ही अपनी पुरानी जिम्मेदारी संभालेंगे।

आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन अधिकारियों का तबादला किया गया है, वे अपने गृह जिलों में या उन जिलों में तैनात नहीं हो सकते जहाँ उन्होंने पिछले चार वर्षों में तीन साल से अधिक समय बिताया है। इस व्यापक फेरबदल से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है, वहीं राजनीतिक दलों ने इसे अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करना शुरू कर दिया है।