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बंगाल चुनाव 2026: नए गठबंधन से बदलेगा वोट बैंक का खेल? जानें किसके साथ जाएंगे अल्पसंख्यक?

पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है. सभी राजनीतिक दल जनता को लुभाने के लिए तमाम तरह के वादे कर रहे हैं. चुनाव की तैयारियों के बीच राज्य में लगभग 30% अल्पसंख्यक वोट बैंक को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. चुनाव में इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है, क्योंकि कई दल इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं

बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए जैसे-जैसे माहौल गर्म हो रहा है, राज्य के महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक वोट बैंक (लगभग 30% मतदाता) पर कब्जा करने के लिए एक लड़ाई छिड़ी हुई है. तृणमूल कांग्रेस ने अपनी 291 उम्मीदवारों की लिस्ट में 47 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस 74 उम्मीदवारों का दावा कर रही है. वहीं हुमायूं कबीर की एजेयूपी के साथ एआईएमआईएम का गठबंधन टीएमसी की पकड़ को कमजोर कर सकता है. ऐसे में सवाल है कि क्या इससे बीजेपी को क्या फायदा होगा? क्या ममता ममता का वोट बैंक बंट जाएगा?.

टीएमसी के 47 अल्पसंख्यक उम्मीदवार

तृणमूल कांग्रेस ने 16 मार्च को अपने उम्मीदवारों सूची लिस्ट जारी की, जिसमें 47 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के साथ 50% महिलाएं और 95 अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रतिनिधि शामिल थे. यह मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे प्रमुख मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में समावेशिता का संकेत देता है. कांग्रेस ने 29 मार्च को 284 उम्मीदवारों की सूची जारी की, जिनमें बहरामपुर से अधीर रंजन चौधरी और गोलपोखर एवं सूती जैसी अल्पसंख्यक बहुल सीटों से कई उम्मीदवार शामिल थे. इस बीच, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने हुमायूं कबीर की एजेयूपी के साथ गठबंधन किया और टीएमसी से नाराज अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाने के लिए 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई.

अधीर रंजन चौधरी ने क्या कहा

कांग्रेस उम्मीदवार अधीर रंजन चौधरी का कहना है ‘मैं मुस्लिम वोटों की स्थिरता के लिए नहीं लड़ रहा हूं. पिछली बार दंगों, फैलाई गई अफवाहों और मुझे हराने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए हिंदुओं को एकजुट करने के प्रयासों के कारण हिंदू वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी को चला गया था. उन्होंने पिछली बार ऐसा किया था, और वो फिर से ऐसा कर सकते हैं. मैं किसी को किसी के खिलाफ वोट न देने के लिए नहीं कहता या मदद नहीं मांगता. मैं किसी से भीख नहीं मांगता. मैं कांग्रेस का उम्मीदवार हूं और निडरता से चुनौती दे रहा हूं. मैं सभी उम्मीदवारों के साथ मिलकर लड़ना चाहता हूं. यहां मेरी सबसे बड़ी ताकत आम जनता है’.

‘अल्पसंख्यक वोट ममता बनर्जी के साथ हैं’

वहीं टीएमसी नेताजॉय प्रकाश मजूमदार का कहना है ‘अल्पसंख्यक वोट ममता बनर्जी के साथ हैं. इसलिए कोई भी उनसे अल्पसंख्यक वोट नहीं छीन सकता. पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी दलों का कोई दबदबा नहीं है. वे सिर्फ अपने वोट बैंक को वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं. ओवैसी और हुमायूं कबीर की बात करें तो, एक लोकतांत्रिक देश में कोई भी किसी भी नाम और किसी भी जाति के तहत चुनाव लड़ सकता है. अल्पसंख्यक वोट बैंक के बंटवारे से ममता बनर्जी को बहुत कम नुकसान होगा’.

बीजेपी का टीएमसी पर आरोप

इधर बीजेपी सांसद राहुल सिन्हा का कहना है कि पूरा मुस्लिम समुदाय जानता है कि ममता बनर्जी किस तरह दोहरी राजनीति कर रही हैं. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के राष्ट्रवादी मुसलमान बीजेपी को वोट देंगे. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी की राजनीति जगजाहिर है और इस बार उन्हें अल्पसंख्यक वोट बैंक से बाहर कर दिया जाएगा.

सभी की नजर अल्पसंख्यक वोटों पर

इस बार सभी की नजर अल्पसंख्यक वोटों पर है. हालांकि हुमायूं कबीर और ओवैसी के साथ आने से अल्पसंख्यकों के वोट बंटने की आशंका है. टीएमसी के 47 उम्मीदवार, उत्तर बंगाल में कांग्रेस का दबदबा और एआईएमआईएम-अजुप की एंट्री बीजेपी विरोधी वोटों को बांट सकता है, जिससे करीबी मुकाबलों में बीजेपी को फायदा हो सकता है.इस बार चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों का बिखराव बड़ा फैक्टर बन सकता है. अगर विपक्षी वोट बंटते हैं और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बना रहता है, तो BJP को अप्रत्याशित बढ़त मिल सकती है.

विश्लेषकों का मानना ​​है कि स्थानीय शिकायतों और नए खिलाड़ियों के कारण टीएमसी के गढ़ में दरारें पड़ रही हैं, जिससे संभावित रूप से बीजेपी को बढ़त हासिल करने में मदद मिल सकती है, खासकर अगर ध्रुवीकरण के दावों के बीच हिंदू एकजुटता बनी रहती है. बीजेपी इसे मुस्लिम बहुल जिलों में विभाजित विपक्ष का लाभ उठाने और तीन-तरफा मुकाबलों को जीत में बदलने के अवसर के रूप में देख रही है.