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नैनीताल पर ‘जल प्रलय’ का खतरा! चूहों के बाद अब मछलियां भी काट रही हैं नैनी झील की जड़ें; माल रोड धंसने की बड़ी चेतावनी

उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के अस्तित्व पर एक नया और चौंकाने वाला खतरा मंडरा रहा है. अब तक यह माना जाता था कि झील की सुरक्षात्मक दीवारों (रिटेनिंग वॉल) को केवल चूहे नुकसान पहुंचा रहे हैं. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि झील के भीतर रहने वाली मछलियां भी इसकी नींव को खोखला कर रही हैं.

मत्स्य विशेषज्ञों के अनुसार, झील के किनारों और दीवारों के पास रहने वाली कुछ विशेष प्रजाति की मछलियां भोजन की तलाश में कीचड़ और नरम मिट्टी में गहरे बिल खोदती हैं. ये बिल धीरे-धीरे दीवारों के आधार को कमजोर कर देते हैं. भारी बारिश या पानी का दबाव बढ़ने पर ये कमजोर हिस्से ढह सकते हैं, जिससे झील की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो जाता है.

‘कॉमन कार्प’ मछली है सबसे बड़ी विलेन

पंतनगर विश्वविद्यालय के मत्स्य विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष मिश्रा के मुताबिक, कॉमन कार्प प्रजाति की मछलियां इस विनाशकारी गतिविधि में सबसे आगे हैं. ये मछलियां झील के तल और किनारों की मिट्टी को लगातार खोदती रहती हैं. इस गतिविधि से दीवारों के पास छेद बन जाते हैं, जिससे मिट्टी ढीली हो जाती है और भविष्य में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है.

17 मार्च तक चलेगा विशेष अभियान

इस गंभीर समस्या को देखते हुए झील विकास प्राधिकरण (LDA) एक्शन मोड में आ गया है. झील की संरचना को बचाने के लिए इन हानिकारक मछलियों को बाहर निकालने का अभियान शुरू कर दिया गया है. यह अभियान 17 मार्च तक जारी रहेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि झील के अस्तित्व को बचाने के लिए इन मछलियों की संख्या नियंत्रित करना अनिवार्य है.

चूहों और मछलियों का डबल अटैक

अब तक झील की दीवारों में होने वाले सुराखों के लिए केवल चूहों को जिम्मेदार माना जाता था, जो मिट्टी में सुरंगें बनाकर नींव कमजोर करते थे. लेकिन अब चूहे और मछलियां मिलकर झील के किनारों को अस्थिर कर रहे हैं. चूहे जमीन के ऊपर से और मछलियां पानी के भीतर से मिट्टी में खाली जगह बना रही हैं.

पर्यटन और अर्थव्यवस्था की रीढ़

नैनी झील केवल एक जल निकाय नहीं, बल्कि नैनीताल के पर्यटन और हजारों लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है. यदि झील की संरचना को नुकसान पहुंचता है, तो इसका सीधा असर शहर की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा. झील के किनारों का नियमित निरीक्षण और चूहों व मछलियों की गतिविधियों की वैज्ञानिक निगरानी ही इस प्राकृतिक धरोहर को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकती है.