सरकार का अपना फैसला ही हैरान करने वाला निकला
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः असम से एक ऐसी खबर सामने आई है जो नागरिकता संशोधन कानून के प्रभाव और कार्यान्वयन को लेकर चल रही चर्चाओं को एक नया मोड़ देती है। कछार जिले की निवासी 59 वर्षीय दीपाली दास, जिन्हें पहले एक विदेशी घोषित कर दिया गया था और जिन्होंने दो साल डिटेंशन सेंटर में बिताए, उन्हें अब के तहत भारतीय नागरिकता प्रदान कर दी गई है। यह मामला असम में नागरिकता के जटिल कानूनी ढांचे और मानवीय संकट के बीच एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
दीपाली दास की कानूनी लड़ाई की शुरुआत 2013 में हुई थी, जब एक पुलिस जांच के दौरान उनकी नागरिकता पर संदेह व्यक्त किया गया था। जांच अधिकारी अजमल हुसैन लस्कर ने जुलाई 2013 में एक चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें कहा गया था कि दीपाली मूल रूप से बांग्लादेश के सिलहट जिले की रहने वाली हैं और मार्च 1971 के बाद अवैध रूप से भारत में दाखिल हुई थीं।
असम के कानून के अनुसार, 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख के बाद भारत में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले किसी भी व्यक्ति को विदेशी माना जाता है। इसी आधार पर, फरवरी 2019 में एक विदेशी ट्रिब्यूनल ने उन्हें अवैध प्रवासी घोषित कर दिया। इसके बाद 10 मई 2019 को उन्हें हिरासत में लेकर सिलचर डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया।
दीपाली दास के वकील धर्मानंद देब ने बताया कि वह लगभग दो वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे रहीं। अंततः, 17 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। उनके वकील के अनुसार, दीपाली मूल रूप से बांग्लादेश के सिलहट जिले के दिप्पुर गांव की रहने वाली थीं और 1987 में उन्होंने हबीगंज जिले के अभिमन्यु दास से शादी की थी। दिलचस्प बात यह है कि वही पुलिस चार्जशीट, जिसने उन्हें विदेशी साबित किया था, बाद में के तहत नागरिकता आवेदन में उनके पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित हुई। क्योंकि सीएए उन अल्पसंख्यकों (हिंदू, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन और पारसी) को नागरिकता देने का प्रावधान करता है जो उत्पीड़न के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान से भारत आए थे।
नागरिकता संशोधन अधिनियम 11 दिसंबर 2019 को संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसे लेकर विशेष रूप से असम में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। हालांकि, कानून के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक नियमों को केंद्र सरकार ने केवल 2024 में अधिसूचित किया। असम में वर्तमान में लगभग दो लाख लोग संदिग्ध नागरिक के रूप में चिह्नित हैं, लेकिन अब तक बहुत कम संख्या में लोगों ने सीएए के माध्यम से नागरिकता के लिए आवेदन किया है। दीपाली दास का मामला उन हजारों लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण हो सकता है जो इसी तरह की कानूनी अनिश्चितता और सामाजिक कलंक का सामना कर रहे हैं। यह कहानी दर्शाती है कि कैसे कड़े कानूनों और लंबी अदालती प्रक्रियाओं के बीच भी एक व्यक्ति का जीवन नाटकीय रूप से बदल सकता है।