चुनाव आयोग पर लग रहे पक्षपात के आरोपों के बीच बड़ा बयान
राष्ट्रीय खबर
पटनाः उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने शनिवार को इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक शासन की अखंडता को बनाए रखने के लिए भारत निर्वाचन आयोग और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसे संवैधानिक संस्थानों को स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए और उन्हें राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए।
चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना में अधिकारों से परे संविधानवाद: संरचना क्यों मायने रखती है विषय पर प्रथम डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि संविधान ने जानबूझकर उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों की निगरानी के लिए विशेष संस्थानों का निर्माण किया है, जहाँ सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया पर्याप्त रूप से तटस्थता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं कर सकती है।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ऐसे संस्थान स्वतंत्र रूप से कार्य करें और राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित न हों। न्यायूर्ति नागरत्ना ने अनुच्छेद 324 के तहत भारत निर्वाचन आयोग के संवैधानिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे तंत्र हैं जिसके माध्यम से राजनीतिक सत्ता का गठन होता है।
उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया पर नियंत्रण प्रभावी रूप से लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की स्थितियों को निर्धारित करता है। टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का संदर्भ देते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि अदालत ने निर्वाचन आयोग को चुनावों की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए सौंपी गई उच्च महत्व की संवैधानिक संस्था के रूप में मान्यता दी है।
उन्होंने कहा, चुनाव मात्र आवधिक घटनाएं नहीं हैं; वे वह तंत्र हैं जिसके माध्यम से राजनीतिक अधिकार स्थापित होते हैं। हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने समय पर चुनाव होने के कारण सरकार में सुचारू परिवर्तनों का पर्याप्त प्रदर्शन किया है। उस प्रक्रिया पर नियंत्रण, वास्तव में, स्वयं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की स्थितियों पर नियंत्रण है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अनुच्छेद 148 के तहत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की संवैधानिक भूमिका पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक व्यय केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं है, बल्कि एक ऐसा तंत्र है जिसके माध्यम से संसाधनों का आवंटन किया जाता है और सरकारी प्राथमिकताओं को लागू किया जाता है। उन्होंने समझाया कि स्वतंत्र निरीक्षण के बिना, वित्तीय निर्णय जांच और जवाबदेही से बच सकते हैं। कैग बाहरी ऑडिट (लेखापरीक्षा) के माध्यम से यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक व्यय की जांच कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र किसी संस्था द्वारा की जाए।