मुख्यमंत्री की पत्नी की चर्चा से बढ़ गयी असम की सियासी गर्मी
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राज्य की 12 सौ बीघा जमीन हड़प लिया
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देश छोड़कर भागने की पूर्व तैयारी है
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एनडीए हर मोर्चे पर विफलः गौरव गोगोई
भूपेन गोस्वामी
गुवाहाटी : असम विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य में राजनीतिक पारा चरम पर है। इसी क्रम में 5 अप्रैल को कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मुख्यमंत्री हिमंत विश्व सरमा और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार एवं गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाकर सियासी हलचल तेज कर दी है। पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री हिमंत विश्व सरमा और उनकी पत्नी रिंकी भुइयां सरमा पर भू-माफिया होने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री के परिवार ने पूरे असम में लगभग 1,200 बीघा जमीन अवैध रूप से हथियाई है। इसके अतिरिक्त, कांग्रेस ने उन पर मंदिर के चंदे में हेरफेर, सरकारी सब्सिडी का दुरुपयोग और चिट फंड घोटालों में शामिल होने के आरोप भी लगाए।
खेड़ा ने दावा किया कि रिंकी भुइयां सरमा के पास तीन देशों (यूएई, एंटीगुआ और मिस्र) के पासपोर्ट हैं। उन्होंने यूएई के गोल्डन कार्ड का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि भारतीय कानून में दोहरी नागरिकता का प्रावधान न होने के बावजूद वे कैसे इन दस्तावेजों को रख रही हैं। खेड़ा ने गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की।
इन आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री हिमंत विश्व सरमा ने इन्हें पूरी तरह से निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपनी हार सुनिश्चित देखकर हताशा में इस तरह के मनगढ़ंत आरोप लगा रही है। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि वे पवन खेड़ा के खिलाफ 48 घंटों के भीतर आपराधिक और दीवानी मानहानि का मुकदमा दर्ज करेंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि असम की जनता इस दुष्प्रचार का जवाब चुनाव में 100 से अधिक सीटें देकर देगी।
असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने कोकराझाड़ में एक रैली के दौरान एनडीए सरकार को बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर विफल बताया। उन्होंने जनता से समावेशी शासन के लिए कांग्रेस को चुनने की अपील की। वहीं, दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भाजपा का पक्ष रखते हुए कहा कि केवल भाजपा ही असम की जमीन, भाषा और पहचान की रक्षा कर सकती है। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अवैध प्रवासियों के खिलाफ उठाए गए कदमों के कारण जनता का भरोसा भाजपा पर बरकरार है। कुल मिलाकर, असम का चुनावी समर अब नीतिगत मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत आरोपों और कानूनी धमकियों के केंद्र में आ गया है।