टीवी बनाम सोशल मीडिया के अंतर्विरोध और कागजी आंकड़ों का खेल
मतदाताओं के मिजाज और नतीजों के बीच बढ़ता फासला
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चैनलों का व्यापारिक हित उलझा
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सोशल मीडिया इस दबाव से मुक्त
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नतीजों के बाद तर्कों की बाजीगरी
रजत कुमार गुप्ता
रांचीः भारतीय लोकतंत्र के महापर्व में मतदान संपन्न होते ही टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर एग्जिट पोल की एक ऐसी बाढ़ आ जाती है, जो वास्तविक नतीजों से पहले ही जनमानस में एक खास तरह की धारणा बनाने का प्रयास करती है। वर्तमान परिदृश्य में यह स्पष्ट विभाजन देखा जा सकता है कि जहाँ मुख्यधारा के टेलीविजन चैनल सत्ताधारी दल (भाजपा) की बढ़त के दावे कर रहे हैं, वहीं सोशल मीडिया के विभिन्न स्वतंत्र चैनल एक सरकार विरोधी लहर का नैरेटिव तैयार करने में जुटे हैं।
टीवी चैनलों की इस प्रवृत्ति के पीछे अक्सर उनकी व्यापारिक मजबूरी को जिम्मेदार ठहराया जाता है। बड़े मीडिया घरानों के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों और कॉरपोरेट निवेश पर निर्भर होता है, जिससे वे अक्सर एक निश्चित राजनीतिक दबाव के घेरे में आ जाते हैं। इसके विपरीत, सोशल मीडिया चैनल, जो इस तरह के भारी-भरकम संस्थागत खर्चों से मुक्त हैं, खुद को सरकार के प्रत्यक्ष दबाव से बाहर बताते हैं। हालाँकि, स्वायत्तता का यह दावा भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कई बार वे अपनी व्यूअरशिप बढ़ाने के लिए जन-असंतोष को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।
सबसे गंभीर सवाल इन सर्वेक्षणों की कार्यप्रणाली पर उठता है। पहले जब जमीनी स्तर पर सर्वे होते थे, तो उनकी आहट सुनाई देती थी—चुनावी क्षेत्रों में सर्वेक्षकों की उपस्थिति दिखती थी। लेकिन हाल के वर्षों में ये सर्वे इतने अदृश्य हो गए हैं कि मतदाताओं को पता भी नहीं चलता कि कब और कहाँ डेटा जुटाया गया। इससे यह गहरा संदेह पैदा होता है कि क्या ये आंकड़े वास्तव में जमीन से आए हैं या फिर अपने आकाओं और मालिकों को खुश करने के लिए वातानुकूलित कमरों में बैठकर कागजी आंकड़े गढ़े गए हैं।
पिछले कई चुनावों (जैसे पश्चिम बंगाल और अन्य राज्य विधानसभा चुनाव) में ये एग्जिट पोल बुरी तरह विफल साबित हो चुके हैं। जब मतदान के दिन ये आंकड़े जमींदोज हो जाते हैं, तो वही विशेषज्ञ शाम को टीवी स्क्रीन पर बैठकर नए-नए कुतर्क गढ़ते नजर आते हैं। कभी साइलेंट वोटर का हवाला दिया जाता है तो कभी अंडरकरेंट की बात की जाती है। अंततः, इस प्रक्रिया में यदि किसी का सबसे अधिक नुकसान होता है, तो वह है मीडिया की विश्वसनीयता का। यदि चुनावी सर्वे केवल धारणा बनाने का औजार बन जाएं, तो वे अपनी लोकतांत्रिक उपयोगिता खो देते हैं।